अमेरिका की ओर से दिए गए न्योते को चीन ने ठुकरा दिया है. अमेरिका चाहता था कि चीन बोर्ड ऑफ पीस (शांति बोर्ड) नाम की नई इंटरनेशनल इनिशिएटिव में शामिल हो, लेकिन बीजिंग ने साफ कह दिया कि वह संयुक्त राष्ट्र (UN) को ही वैश्विक व्यवस्था का केंद्र मानता है. यह जानकारी भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की. उन्होंने चीन के विदेश मंत्रालय (MOFA) का हवाला देते हुए यह बयान दिया.
चीन का साफ संदेश- UN से अलग कोई मंच नहीं
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान के मुताबिक, चीन को अमेरिका की ओर से बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता मिला था, लेकिन चीन हमेशा सच्चे बहुपक्षवाद (Multilateralism) में भरोसा करता है. चीन ने कहा कि दुनिया की स्थिति चाहे जैसी भी बदले, वह संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में रखने वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, इंटरनेशनल लॉ पर आधारित व्यवस्था और UN चार्टर के सिद्धांतों की रक्षा करता रहेगा.
ट्रंप का दावा- UN से ज्यादा असरदार होगा बोर्ड ऑफ पीस
यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस हफ्ते स्विट्जरलैंड के दावोस में होने वाली वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम बैठक के दौरान गाजा बोर्ड ऑफ पीस को फॉर्मली शुरू करने की तैयारी में हैं. रिपोर्टर्स से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि यह बोर्ड अब तक का सबसे प्रतिष्ठित बोर्ड होगा और यह संयुक्त राष्ट्र से ज्यादा काम करके दिखाएगा. हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि बोर्ड ऑफ पीस, यूएन के साथ मिलकर काम करेगा, लेकिन उसका असर ज्यादा होगा.
ट्रंप बोले- ईरान की न्यूक्लियर धमकी खत्म करने से आई शांति
ट्रंप ने दावा किया कि मध्य पूर्व में शांति इसलिए आई, क्योंकि ईरान की न्यूक्लियर धमकी को खत्म किया गया. उनका कहना था कि अगर ऐसा नहीं होता, तो गाजा और पूरे मध्य पूर्व में शांति संभव नहीं थी.
तट्रंप ने कहा कि वह चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा देश इस बोर्ड में शामिल हों. जिन देशों में जनता का नियंत्रण और ताकत है, वे इसमें आएं. उन्होंने यह भी बताया कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को न्योता दिया गया. पुतिन ने इसे स्वीकार कर लिया. ज्यादातर देशों ने बोर्ड में शामिल होने पर सहमति दे दी है. उनके मुताबिक, मुझे नहीं लगता कि कोई देश है जिसने अब तक मना किया हो.
गाजा बोर्ड ऑफ पीस का मकसद क्या है?
गाजा बोर्ड ऑफ पीस को 20-पॉइंट पीस प्लान के फेज-2 का हिस्सा बताया जा रहा है. इसका मकसद है पश्चिम एशिया में स्थिरता लाना, युद्ध के बाद गाजा को फिर से बनाने की निगरानी और एडमिनिस्ट्रेटिव स्ट्रक्चर को मजबूत करना यह योजना पहले सिर्फ गाजा युद्ध तक सीमित थी, लेकिन अब इसे दुनिया भर के संघर्षों में मध्यस्थता के तौर पर देखा जा रहा है.
बोर्ड में क्या-क्या जिम्मेदारी होगी?
व्हाइट हाउस के बयान के अनुसार, बोर्ड के सदस्य इन अहम कामों की निगरानी करेंगे जिसमें शामिल है एडमिनिस्ट्रेटिव क्षमता बढ़ाना, क्षेत्रीय देशों से रिश्ते मजबूत करना, गाजा को फिर से बनाना और इनवेस्टर को आकर्षित करना और बड़े पैमाने पर फंड जुटाना.
1 अरब डॉलर देने वालों को पर्मानेंट सीट
इस बोर्ड की एक अहम शर्त भी सामने आई है. जो देश 1 अरब डॉलर (करीब 9 हजार करोड़ रुपये) देंगे, उन्हें पर्मानेंट मेंबर सीट मिलेगी. जो देश पैसा नहीं देंगे, वे भी शामिल हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ 3 साल के लिए. अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने सीएनबीसी को दिए इंटरव्यू में बताया कि अब तक करीब 25 देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने की सहमति दे दी है.
किन देशों ने न्योता स्वीकार किया?
अब तक जिन देशों ने ट्रंप के निमंत्रण को स्वीकार किया है, उनमें शामिल हैं इजराइल, कोसोवो, संयुक्त अरब अमीरात, हंगरी, बेलारूस, अजरबैजान, मिस्र, आर्मेनिया, तुर्की, पाकिस्तान, कतर और जॉर्डन.
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