बांग्लादेश चुनाव से पहले चीन की बड़ी चाल! जमात-ए-इस्लामी से मुलाकात के पीछे क्या है बीजिंग का गेम प्लान?

China Jamaat Meeting: बांग्लादेश चुनाव से ठीक पहले चीन के राजदूत की जमात-ए-इस्लामी से मुलाकात ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है. यह कदम चीन की चुनावी रणनीति, निवेश सुरक्षा और भारत के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश से जुड़ा माना जा रहा है. मीडिया रिपोर्टस के अनुसार, बीजिंग हर ताकतवर खिलाड़ी से संपर्क में रहना चाहता है.

By Govind Jee | January 12, 2026 6:41 PM

China Jamaat Meeting: बांग्लादेश में चुनाव सिर पर हैं और सियासत का पारा लगातार चढ़ रहा है. ऐसे वक्त में चीन के राजदूत याओ वेन का जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान से मिलना सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं माना जा रहा. दक्षिण एशिया की राजनीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि यह कदम चीन की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह चुनाव से पहले हर ताकतवर खिलाड़ी को अपने संपर्क में रखना चाहता है.

China Jamaat Meeting in Hindi: जमात से मिलने के पीछे चीन की असली सोच

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, चीन जानता है कि जमात-ए-इस्लामी की असली ताकत संसद की सीटों में नहीं, बल्कि सड़कों पर दिखती है. चुनाव के समय जमात के पास बड़ी संख्या में समर्थकों को एक साथ जुटाने की क्षमता है. पार्टी का संगठन मजबूत है और कार्यकर्ता अनुशासित माने जाते हैं. यही वजह है कि राजनीतिक उथल-पुथल के समय जमात माहौल बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है.

चुनाव बाद के हालात को लेकर चीन सतर्क

सूत्र बताते हैं कि चीन को बांग्लादेश में चुनाव के बाद बनने वाली सरकार को लेकर पूरी तरह भरोसा नहीं है. राजनीतिक गठबंधन बदल रहे हैं और हालात तेजी से करवट ले रहे हैं. ऐसे में बीजिंग किसी एक दल पर दांव लगाने के बजाय हर प्रभावशाली ताकत से रिश्ते बनाए रखना चाहता है. जमात से संपर्क इसी सोच का हिस्सा माना जा रहा है. (China Jamaat Meeting Bangladesh Election in Hindi)

चीनी निवेश की सुरक्षा सबसे बड़ा कारण

चीन ने बांग्लादेश में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत बड़े पैमाने पर निवेश किया है. बंदरगाह, बिजली परियोजनाएं और सड़क-पुल जैसे कई अहम काम चल रहे हैं. अगर चुनाव के दौरान हालात बिगड़ते हैं, प्रदर्शन होते हैं या हिंसा फैलती है, तो इन प्रोजेक्ट्स पर सीधा असर पड़ सकता है. सूत्रों के मुताबिक, चीन जमात नेतृत्व से बात कर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि किसी भी तनाव का असर उसके प्रोजेक्ट्स और कर्मचारियों पर न पड़े.

भारत के मुकाबले संतुलन की राजनीति

सरकारी सूत्र यह भी बताते हैं कि जमात-ए-इस्लामी का रुख पारंपरिक तौर पर भारत विरोधी रहा है. चीन के नजरिये से यह बात उसे एक ऐसा विकल्प बनाती है, जो जरूरत पड़ने पर भारत के असर को संतुलित कर सकता है. अगर चुनाव के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में बदलाव होता है, तो चीन नहीं चाहता कि वह किसी भी हाल में कमजोर स्थिति में आए.

ढाका को भी गया एक साफ संदेश

इस मुलाकात को बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है. संदेश साफ है कि चीन सिर्फ सत्ता में बैठे लोगों तक सीमित नहीं है. अगर जरूरत पड़ी, तो वह अलग-अलग ताकतों से बातचीत करने में हिचकिचाएगा नहीं. हालांकि सूत्र यह भी साफ करते हैं कि इस मुलाकात को किसी दल के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

चुनाव से ठीक पहले क्यों अहम है यह मुलाकात

चीनी राजदूत याओ वेन ने सोमवार को ढाका में जमात प्रमुख शफीकुर रहमान से उनके दफ्तर में शिष्टाचार भेंट की. उनके साथ डिप्टी चीफ ऑफ मिशन ल्यू युइन और राजनीतिक निदेशक झांगजिंग समेत कई चीनी अधिकारी मौजूद थे. दोनों पक्षों ने चीन-बांग्लादेश संबंधों और आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की. जमात-ए-इस्लामी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि चीन और बांग्लादेश के रिश्ते लंबे समय से दोनों देशों के लोगों के लिए फायदेमंद रहे हैं. पार्टी ने यह भी कहा कि आने वाले समय में यह दोस्ती और मजबूत होगी.

पहले से चल रहा है चीन-जमात संपर्क

यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब आम चुनाव में करीब एक महीना ही बचा है. जमात-ए-इस्लामी इस बार युवा पार्टी एनसीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है. यही एनसीपी वह दल है, जिसने पिछले साल छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटाया था. हाल ही में जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के छात्र चुनाव में भी इस गठजोड़ को जीत मिली है. पिछले साल जमात प्रमुख शफीकुर रहमान के नेतृत्व में एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल चीन गया था. यह 2024 के बाद दूसरा आधिकारिक दौरा था. जमात के महासचिव मिया गोलाम परवार ने इस दौरे को दोनों देशों के लिए अहम बताया था. बांग्लादेशी समाचार पोर्टल जागो न्यूज के मुताबिक, यह यात्रा चीन-बांग्लादेश राजनयिक संबंधों की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर हुई थी. 

चीनी राजदूत याओ वेन पहले यह भी कह चुके हैं कि पिछले एक दशक में चीन का संपर्क बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी से लगभग टूट गया था. उनके मुताबिक, अब चीन ने फैसला किया है कि वह बांग्लादेश की हर अहम राजनीतिक ताकत से दोबारा बातचीत करेगा.

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