संजय सागर
-घर व समाज के लिए वरिष्ठ नागरिक है मूल स्तंभ
-कल के अच्छा के लिए हम वृद्धों को सम्मान और सेवा करें
खोरठा भाषा में कहावत है "बूढ़ा बिना घर नहीं और काड़ा बिना हर नहीं" सचमुच में यह कहावत घर व समाज के लिए सत्य साबित हुई है. हमारे भारतीय समाज में बड़े बुजुर्गों का उच्च सम्मान आरम्भ काल से रह है. क्योंकि बड़े बुजुर्ग हमें बहुत से अनुभवों का बोध कराते हैं. हम अपने घर व समाज में ही देखते हैं कि जो बड़े- बुजुर्ग और वृद्ध होते हैं ,वे अपना स्वार्थ का त्याग कर हमारी खुशी के लिए समर्पित रहते हैं. जब किसी मानव का जन्म होता है ,तो उनके बचपन का अधिकांश समय दादा- दादी के गोद में गुजरते हैं. माँ -बाप से ज्यादा बच्चों को चलना -फिरना सिखाते हैं. इतना ही नहीं विभिन्न तरह की कहानियां सुनाकर अच्छे संस्कार भरने का काम करते हैं.
वही संस्कारों के माध्यम से हम उच्च मार्ग की ओर जाते हैं. लेकिन अफसोस होता है, कि कुछ लोग इसे भूल जाते हैं. अपने वृद्ध माता पिता या दादा-दादी को मान -सम्मान देना भूल जाते हैं. इतना ही नहीं वृद्धों को वृद्धा आश्रम में छोड़ आते हैं. कई घरों में मुझे देखने को मिला कि अगर कोई वृद्धि बीमार पड़ गये हो तो उन्हें सेवा करना अपना कर्तव्य भी नहीं समझते हैं. और अंततः वह वृद्ध व्यक्ति मौत के करीब आते -आते दुनिया से चले जाते हैं. तब उनके घर वालों को होंश आते हैं कि वृद्ध व्यक्ति हमारे जीवन के लिए विशिष्ट अंग थे. उनके मरने के बाद ब्रह्मभोज में लाखों रुपये खर्च करते हैं. लेकिन मरने से पहले उन्हें सेवा करने में ध्यान नहीं देते है. जो लोग बड़े बुजुर्गों को सेवा करते हैं, सम्मान करते हैं वे महान होते हैं.
लेकिन की परिवारों के अक्सर देखा जाता है कि जिस घर को बनाने में एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है, वृद्ध होने के बाद उसे उसी घर में एक तुच्छ वस्तु समझी जाता है. बड़े बूढ़ों के साथ यह व्यवहार देखकर लगता है जैसे हमारे संस्कार ही मर गए हैं. बुजुर्गों के साथ होने वाले अन्याय के पीछे एक मुख्य वजह सोशल स्टेटस मानी जाती है. सब जानते हैं कि आज हर इंसान समाज में खुद को बड़ा दिखाना चाहता है और दिखावे की आड़ में बुजुर्ग लोग उसे अपनी सुंदरता पर एक काला दाग दिखते हैं. बड़े घरों और अमीर लोगों की पार्टी में हाथ में छड़ी लिए और किसी के सहारे चलने वाले बुढ़ों को अधिक नहीं देखा जाता है. वजह वह इन बुढ़े लोगों को अपनी आलीशान पार्टी में शामिल करना तथाकथित शान के खिलाफ समझते हैं. यही रुढ़िवादी सोच उच्च वर्ग से मध्यम वर्ग की तरफ चली आती है. आज के समाज में मध्यम वर्ग में भी वृद्धों के प्रति स्नेह की भावना कम हो गयी है.
वृद्ध होने के बाद इंसान को कई रोगों का सामना करना पड़ता है. चलने फिरने में भी दिक्कत होती है. लेकिन यह इस समाज का एक सच है कि जो आज जवान है उसे कल बुढ़ा भी होना होगा और इस सच से कोई नहीं बच सकता। लेकिन इस सच को जानने के बाद भी जब हम बूढ़े लोगों पर अत्याचार करते हैं तो हमें अपने मनुष्य कहलाने पर शर्म महसूस होती है. हमें समझना चाहिए कि वरिष्ठ नागरिक समाज की अमूल्य विरासत होते हैं.उन्होंने देश और समाज को बहुत कुछ दिया होता है. उन्हें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का व्यापक अनुभव होता है. आज का युवा वर्ग राष्ट्र को उंचाइयों पर ले जाने के लिए वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव से लाभ उठा सकता है. अपने जीवन की इस अवस्था में उन्हें देखभाल और यह अहसास कराये जाने की जरुरत होती है कि वे हमारे लिए खास महत्व रखते हैं. हमारे शास्त्रों में भी बुजुर्गों का सम्मान करने की राह दिखलायी गयी है.
अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस कब से हुई शुरू
संयुक्त राष्ट्र ने भी विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यव्हार और अन्याय को खत्म करने के लिए और जागरुकता फैलाने के लिए 14 दिसम्बर,1990 को यह निर्णय लिया कि हर साल 1 अक्टुबर को अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस के रूप में मनाकर हम बुजुर्गों को उनका सही स्थान दिलाने की कोशिश करेंगे. 1 अक्टुबर, 1991 को पहली बार अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाया गया. जिसके बाद से इसे हर साल इसी दिन मनाते हैं.
वृद्धों की रक्षा के लिए कानून
भारत में भी वृद्धों की सेवा और उनकी रक्षा के लिए कई कानून और नियम बनाए गए हैं. केंद्र सरकार ने भारत में वरिष्ठ नागरिकों के आरोग्यता और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1999 में वृद्ध सदस्यों के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार की है. इस नीति का उद्देश्य व्यक्तियों को स्वयं के लिए तथा उनके पति या पत्नी के बुढ़ापे के लिए व्यवस्था करने के लिए प्रोत्साहित करना इसमें परिवारों को अपने परिवार के वृद्ध सदस्यों की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित करने का भी प्रयास किया जाता है. इसके साथ ही 2007 में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक संसद में पारित किया गया है. इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है. लेकिन इन सब के बावजूद हमें अखबारों और समाचारों की सुर्खियों में वृद्धों की हथा और लूटमार की घटनाएं देखने को मिल ही जाती है। वृद्धाश्रमों में बढ़ती संख्या इस बात का साफ सबूत है कि वृद्धों को उपेक्षित किया जा रहा है. हमें समझना होगा कि अगर समाज के इस अनुभवी स्तंभ को यूं ही नजरअंदाज किया जाता रहा तो हम उस अनुभव से भी दूर हो जाएंगे जो इन लोगों के पास है.
