मनोज कुमार झा, युवा कवि
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हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि नरेश सक्सेना पिछले छह दशकों से कविता की दुनिया में सक्रिय हैं. उनके कविता संग्रहों ‘समुद्र पर हो रही है बारिश’ और ‘सुनो चारुशीला’ को आलोचकों और पाठकों ने काफी सराहा है. कविता के लिए ‘पहल’ और ‘शमशेर सम्मान’ से नवाजे जा चुके नरेश सक्सेना साहित्य के साथ फिल्म निर्देशन और पटकथा लेखन में भी मजबूत दखल रखते हैं और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं. हाल ही में प्रथम ‘जनकवि नागार्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना से प्रीति सिंह परिहार की बातचीत…
Qकविता और साहित्य को अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग तरह से परिभाषित किया है. आपके लिए साहित्य क्या है?
साहित्य की सारी विधाएं महत्वपूर्ण हैं. मेरे लिए कविता ज्यादा आकर्षक हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कविता साहित्य में सारे काम कर देगी. हर विधा अपना-अपना काम करती है.
साहित्य की सारी विधाएं भाषा का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन भाषा अपने सबसे सूक्ष्म और सुंदर रूप में कविता में अाती है. कविता का सौंदर्य दूर तक जाता है. बेशक कहानियां भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनायी जाती हैं, लेकिन कविता बहुत दूर तक का सफर तय करती है. हर टाइम एवं स्पेस में ट्रेवल करती है. हम बर्तोल ब्रेष्ट को आज भी पढ़ते हैं. ब्रेष्ट जर्मनी में लिख रहे थे, पढ़े भारत में भी जा रहे हैं. जर्मनी और भारत दो अलग-अलग जमीनें हैं.
Qकविताएं लिखी खूब जा रही हैं, लेकिन व्यापक समाज का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं?
दरअसल, कविताओं की जगह खत्म की जा रही है. पत्रिकाएं और अखबार कविता से मुंह मोड़ रहे हैं. बहुत से अखबारों में साहित्य का पेज बंद कर दिया गया है. साहित्य से ऐसे मुंह फेरा जा रहा है, जैसे साहित्य सबसे निरर्थक चीज हो.
हमने इसे स्वीकार भी कर लिया है. हम भूल जाते हैं कि हिंदी भाषा हमारे यहां बेपढ़े-लिखे लोगों की भाषा बनकर रह गयी है और उन्हीं के बूते बची भी है. पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी बोलते हैं. आइआइएम, आइआइटी जैसे संस्थानों में हिंदी में बोलनेवाले को बेपढ़े-लिखे की तरह देखा जाता है. ऐसे में कोई एक ऐसी भाषा की कविता क्यों पढ़ेगा, जिस भाषा को पढ़कर कोई नौकरी नहीं मिलती?
Qक्या जीवन से कविता के लोप को मानवता का संकट कहा जा सकता है?
जब मानवता ही संकट में हाे, तो कविता की क्या बिसात. हमारा संविधान समान अधिकार, समान अवसर, समान शिक्षा की बात कहता है, लेकिन कहां समानता है? सत्तर साल हो गये आजाद हुए, देश के आधे बच्चे कुपोषित हैं. कोई भी देश और परिवार सबसे पहले अपने बच्चों के भोजन का इंतजाम करता है, यहां तो भोजन ही सबसे बाद में है. हमारे यहां बच्चों की मृत्युदर सबसे अधिक है. यह मानवता का संकट ही तो है. मौजूदा सरकार, सबसे ज्यादा धार्मिक सरकार है, और धर्म में क्रूरता सर्वोपरि है. ऐसे में मनुष्यता और कविता सब संकट में ही होंगे.
Qआपने ‘ईश्वर की औकात’, ‘रंग’, ‘गुजरात-2’ जैसी कविताएं लिखी हैं. आज के राजनीतिक माहौल में क्या इसके खतरे उठाने पड़ सकते हैं?
सच लिखने-बोलने के खतरे तो उठाने ही पड़ते हैं. चूंकि हिंदी भाषा की अहमियत बहुत कम है, इसलिए हमें खतरा नहीं है. उन्हें भी मालूम है कि कहीं जब कोई कविता पाठ होता है, तो करीब पचास लोग आते हैं, ज्यादा हुआ तो सौ लोग. इतने लोगों से कोई फर्क नहीं पड़ता. इसलिए वे कहते हैं कि करने दो जो कर रहे हैं, क्या कर लेंगे. हम इनकी इस उपेक्षा के कारण बचे हुए हैं.
Qआपका पहला कविता संग्रह ‘समुद्र पर हो रही है बारिश’ 60 की उम्र में आया, वह भी ज्ञानरंजन जी के बहुत इसरार पर. दूसरा, ‘सुनो चारुशीला’ कालिया जी की कोशिशों से आया, जबकि आप लगातार लिख रहे हैं. संग्रह के प्रकाशन को लेकर अनमनापन क्यों?
इसे मेरी एक कमी मान सकते हैं. मैं थोड़ा लापरवाह हूं. कविताएं सहेज कर नहीं रख पाता. दूसरी अहम बात यह है कि जिस किताब को खरीदनेवाले ही नहीं हैं, तो उसे छपवाने का क्या मतलब! असल में मैं बहुत व्यस्त रहता हूं दूसरे कामों में. मैंने फिल्में बनायी, नाटक लिखे, म्यूजिकल कंपोजिशन किये. एक काम बहुत है जान लेने के लिए और मैं दस काम लिये चलता हूं.
Qआपकी नजर में हिंदी के एेसे साहित्यकार, जिन पर फिल्म बननी चाहिए?
हर एक पर बननी चाहिए. आप बताइए किस पर नहीं बननी चाहिए? क्या विनोद कुमार शुक्ल पर नहीं बननी चाहिए? क्या विष्णु खरे और अशोक वाजपेयी पर नहीं बननी चाहिए? मैंने विनोद कुमार शुक्ल और मंगलेश डबराल पर कुछ डाक्यूमेंटेशन किये हैं. मैं कर रहा हूं ये काम.
Qआप फिल्म देखते हैं? अपनी कुछ पसंदीदा फिल्मों के बारे में बताएं.
इतनी फिल्में हैं कि नाम गडमड हो सकते हैं. दुनिया के हर देश में अच्छी फिल्में बनती हैं. ईरान जैसे देश में दिल को हिला देनेवाली फिल्में बनी हैं और खुशी से भर देनेवाली फिल्में भी. इन फिल्मों को देखना एक तरह से क्लोज रीडिंग करना है. अकीरा कुराेसावा की फिल्म ‘राशोमोन’ बताती है कि आंखों से देखा हुआ दृश्य भी झूठ बोल रहा है. हो कुछ रहा है और आप देख कुछ और रहे हैं. यह आंखें खोल देनेवाली फिल्म है. इसी तरह मृणाल सेन की फिल्म ‘एक दिन प्रतिदिन’ का ख्याल आ जाता है.
Qआपको पहला ‘जनकवि नागार्जुन पुरस्कार’ मिला. इसके बाद अापको जनकवि कहे जाने पर फेसबुक पर एक बहस सी छिड़ गयी. इस पर अापकी प्रतिक्रिया?
मुझे जनकवि किसी ने कहा ही नहीं. इसलिए इस बहस का कोई आधार ही नहीं था. एक सज्जन हैं, उन्हें लगा कि मुझे जनकवि नरेश सक्सेना कहा गया.
यह उन्हें अच्छा नहीं लगा, तो उन्होंने कह दिया कि नरेश सक्सेना जनकवि नहीं हैं. अशोक कुमार पांडे ने यह बात फेसबुक पर लिख दी कि उनके आलोचक मित्र ने ऐसा कहा है. फिर तो पूरा हिंदी साहित्य टूट पड़ा यह बताने में कि जनकवि क्या होता है. लेकिन, किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि जनकवि कहा भी गया है या नहीं.
इस पर गोपेश्वर सिंह का पहले लिखा गया एक बहुत अच्छा लेख भी सामने आया. इसके बाद कवि सुभाष राय मेरे घर आये, तो उन्होंने भी यही बात कही. मैंने उन्हें कहा ये प्रशस्ति पत्र देख लीजिए और पढ़ लीजिए, इसमें कहीं भी मुझे जनकवि नहीं कहा गया है. कुल मिलाकर इस पूरी बहस का कोई आधार नहीं था. इसलिए मैं बीच में नहीं बोला, क्योंकि मेरे बोलने का कोई औचित्य नहीं था.
सामाजिक विसंगतियों की अभिव्यक्ति
व्यंग्य लेखन एक गंभीर लेखकीय कर्म है. इसका जन्म समय और समाज की विसंगतियों से उपजे असंतोष की अभिव्यक्ति से होता है. प्रभात कुमार की ‘ऐसा देस है मेरा’ व्यंग्य संग्रह इस बात की गवाही देता है. हिंदी साहित्य में व्यंग्य की शुरुआत भक्ति-काल से मानी जा सकती है.
मुसलमानों-हिंदुओं की धर्मांधता, गरीबी-अमीरी, रूढ़िवादिता आदि पर कबीर का लिखा विशुद्ध व्यंग्य था. उनके बाद भारतेंदु हरिश्चंद्र, ब्रदीनारायण प्रेमघन, प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त, प्रेमचंद से होते हुए व्यंग्य ने जब हरिशंकर परसाई युग में कदम रखा, तो उसमें सामाजिक विषमता, मानवीयता, करुणा, जनपक्षधर दृष्टि और अच्छे से निकलकर आयी.
प्रभात कुमार किताब की भूमिका में स्पष्ट कर देते हैं कि व्यंग्य उनके लिए कोई सस्ती चीज, हंसाने का सामान नहीं है. वे हास्य और व्यंग्य के बीच के मूलभूत फर्क को बेहतर ढंग से समझते हैं, और वर्तमान समय में लोकप्रिय मंचीय साहित्यिकों द्वारा व्यंग्य के नाम पर फूहड़ हास्य को सिरे से खारिज करते हैं. इस किताब के व्यंग्य पढ़ने पर लेखक की यह कोशिश लगातार दिखायी देती है कि वह अपने समय, समाज और साहित्य को जैसा देखता-समझता है, वैसा ही लिखे. इसलिए, प्रभात कुमार के व्यंग्य लेखन की भाषा सप्रयास नहीं है.
समाज ही लेखक को अनुभव देता है और उसी के अनुरूप भाषा भी सिखाता है. यही कारण है कि प्रभात कुमार की भाषा भी उनके कथ्य का अनुसरण करती है. यह मुद्दा बहस का हो सकता है, कि उनकी भाषा का शिल्प-कौशल कितना बेहतर है, कितना नहीं. इसके परे, इस किताब के व्यंग्य सामाजिक विद्रूपताओं और विसंगतियों पर प्रभात कुमार की अपनी मौलिक अभिव्यक्तियां हैं.
प्रभात कुमार के व्यंग्य झटके से वार नहीं करते, अपितु हौले-से आपके भीतर लंबे समय तक सालनेवाली खरोंच देते हैं. उनका रचना-संसार व्यापक है. उनके लेखन में महिलाओं के मुद्दे, मध्यमवर्गीय समाज, भ्रष्टाचार, गरीबी, शिक्षा-व्यवस्था, राजनीति, साहित्यिक दुनिया आदि विषयों के रूप में मौजूद हैं. आम आदमी की छोटी-छोटी परेशानियों, घर के भीतर के परिदृश्य भी प्रभात कुमार के व्यंग्यों में स्थान-प्राप्त हैं.
प्रभात कुमार, ‘विभिन्न माध्यमों पर संतोष उत्सुक’ पेन-नेम के साथ लिखते हैं. संतोष उनकी पत्नी हैं और कई व्यंग्यों में किरदार के बतौर उपस्थित दिखायी भी देती हैं. सामाजिक विसंगतियों पर बात करना उनकी निराशा से उपजा हुआ नहीं है, बल्कि मनुष्य व समाज की कमजोरियों पर बात करके उन्हें दूर करने का उद्देश्य रखता है. यह व्यंग्य जीवन की समीक्षा हैं. यह आपको सोचने पर बाध्य करते हैं. प्रभात कुमार के व्यंग्य चेतना में बदलाव लाते हैं और समाज में फैली गैरबराबरी, भ्रष्टाचार, सामंजस्यहीनता के प्रति आपको जागरूक करते हैं. यह किताब बहुत पठनीय और संग्रह करने योग्य है.
देवेश
