आदिकाल से हमारे पूर्वज प्रकृति की आराधना करते रहे हैं. सनातन धर्म में हमारे यहां मनाये जानेवाले प्रत्येक त्योहार और व्रत में प्रकृति पूजन का महत्व रहा है.
ऐसा ही एक सुख एवं समृद्धि का प्रतीक व्रत है- वट सावित्री. सुहागिन स्त्रियां पति की दीर्घायु कामना लिये निर्जला रहकर यह व्रत रखती हैं. मान्यता है कि बरगद के वृक्ष की आयु सबसे लंबी होने के कारण सुहागिनें पति की लंबी आयु के लिए वटवृक्ष का पूजन करती हैं. यह व्रत ज्येष्ठ मास के त्रियोदशी से अमावस्या तक मनाया जाता है.
पौराणिक कथा के अनुसार ज्येष्ठ अमावस के दिन ही सावित्री, यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले आयी थी. बरगद वृक्ष की लटकती शाखाओं को सावित्री के रूप का स्वरूप माना जाता है. इस व्रत को रखने से वैवाहिक जीवन में आनेवाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और दांपत्य जीवन में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है.
व्रत का मुहूर्तकाल : इस बार यह व्रत 15 मई, मंगलवार के दिन किया जायेगा. अमावस्या तिथि का आरंभ 14 मई, सोमवार को 19:46 से होगा, जिसका समापन 15 मई, बुधवार को 17:17 पर होगा.
– विनीता चैल
