II दिलीप मंडल II
पूर्व मैनेजिंग एडिटर, इंडिया टुडे
बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के सार्वजनिक जीवन को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटकर देखा जा सकता है. आजादी से पहले उनकी चिंताओं में जाति मुक्ति और जाति के विनाश का प्रश्न सबसे ऊपर नजर आता है.
इस दौर में वे मंदिर प्रवेश और सार्वजनिक तालाब से पानी पीने के हक का आंदोलन चलाते हैं और अछूतों के लिए अलग निर्वाचन का हक हासिल करके की कोशिश करते हैं. हालांकि, इस समय भी वे भारत में मुद्रा की समस्या, अल्पसंख्यक प्रश्न, स्त्री के सवालों और मजदूरों की समस्याओं से टकराते हैं.
आजादी के बाद वे राष्ट्र निर्माता के रूप में उभरते हैं और संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बनते हैं और फिर आजाद भारत की पहली निर्वाचित सरकार में कानून मंत्री की भूमिका निभाते हैं. इस चरण में वे अन्य पिछड़ा वर्ग के सवालों को उठाते हैं और स्त्री के अधिकारों के लिए कानून बनाने की कोशिश करते हैं तथा इसी सवाल पर केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा भी देते हैं.
तीसरे चरण में बाबासाहेब अपनी राजनीतिक पार्टी बनाते हैं, समाजवादियों के साथ संवाद शुरू करने की कोशिश करते हैं और हिंदू धर्म का त्याग करके बौद्ध धर्म अपनाते हैं.
क्या इन तीन अलग-अलग चरणों में फैले बाबासाहेब के जीवन में कोई ऐसा तार है, जो उनके पूरे व्यक्तित्व को समेटता है? किसी को ऐसा लग सकता है कि मुख्य रूप से जाति का प्रश्न उठानेवाले आंबेडकर आजादी के दौर में और उसके फौरन बाद राष्ट्र निर्माता की भूमिका क्यों ग्रहण कर लेते हैं तथा जिस समय एक नवजात राष्ट्र बन ही रहा होता है, तो वे स्त्रियों के अधिकार के सवाल पर सरकार से बाहर आकर प्रतिपक्ष की भूमिका क्यों अपना लेते हैं और फिर जीवन के आखिरी दौर में वे बौद्ध धर्म क्यों अपना लेते हैं?
पहली नजर में ये अंतर्विरोधी स्थितियां लग सकती हैं. पर हकीकत में ऐसा नहीं है. बाबासाहेब छात्र जीवन से ही एक ऐसे आदर्श समाज और राष्ट्र की कल्पना करते हैं, जहां सामाजिक लोकतंत्र हो. वे इंसान और इंसान के बीच जन्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हैं और सामाजिक के साथ आर्थिक विषमता को भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक मानते हैं.
इस मायने में बाबासाहेब अपने समय के सर्वाधिक आधुनिक भारतीय चिंतकों में हैं, जिनके विचारों के केंद्र में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व हैं. ये फ्रांस की क्रांति से आये विचार हैं, जो आधुनिक लोकतंत्र के केंद्रीय विचार हैं. बाबासाहेब की राय में समानता और स्वतंत्रता लाने में तो एक हद तक कानून प्रभावी हो सकते हैं, पर सामाजिक रूप से बंटे हुए और हजारों जातियों में बंटे लोगों में बंधुत्व कैसे आ पायेगा?
राष्ट्र निर्माण के लिए बाबासाहेब बंधुत्व को एक जरूरी तत्व के रूप में देखते हैं. उनके ये विचार संविधान सभा के आखिरी भाषण में बेहद मजबूती से आते हैं. वे राष्ट्र को एक आध्यात्मिक विचार मानते हैं. वे लिखते हैं- ‘राष्ट्र एक सामाजिक एहसास है. यह एकता की ऐसी उदात्त भावना है, जिससे प्रेरित होनेवाले तमाम लोग एक दूसरे को भाई-बंद यानी अपना मानते हैं.’ लोकतंत्र के लिए भी वे ऐसे ही विचार रखते हैं.
उनके मुताबिक, ‘लोकतंत्र सिर्फ एक शासन पद्धति नहीं है. यह सामूहिकता का साझा एहसास है. लोकतंत्र का अलगाव या अलग-थलग रहने के विचार से कोई मेल नहीं है, जिसमें कुछ लोग विशेषाधिकार से संपन्न हों और बाकी लोग अधिकारों से वंचित हों.’ बाबा साहेब के इन विचारों से उनकी जाति विरोधी मुहिम, संविधान सभा में उनके कृतित्व, स्त्री मुक्ति के उनके प्रयासों या हिंदू धर्म त्यागने के उनके फैसले को समझा जा सकता है.
बाबासाहेब जाति को समाज और राष्ट्रविरोधी बताते हैं. वे इसे एक बीमारी के तौर पर चिह्नित करते हैं और सवर्ण हिंदुओं का आह्वान करते हैं कि वे तुरंत इससे मुक्त हो जाएं, क्योंकि यह न सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ है, बल्कि यह बाकी लोगों को भी बीमार बना रही है. उनकी मान्यता है कि जाति व्यवस्था में हर जाति दूसरी जाति से नफरत करती हैं और यह बंधुत्व के विचार को पनपने नहीं देगी. बाबासाहेब के मुताबिक, बंधुत्व के विचार के बिना कोई राष्ट्र बन नहीं सकता.
वे जानते थे कि जाति की समस्या आसानी से खत्म होने वाली नहीं है. इसलिए वे बहुत सोच समझकर संविधान सभा में कहते हैं कि ‘भारत एक बनता हुआ राष्ट्र है.’ वे संविधान सभा का आह्वान करते हैं कि अगर हमने सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर नहीं किया, तो वंचित लोग उस ढांचे को नष्ट कर देंगे, जिसे संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है.
इस वजह से बाबासाहेब आजादी से पहले जब जाति से लड़ रहे हैं और जाति के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं, तो दरअसल वे राष्ट्र निर्माण का ही काम कर रहे होते हैं. राष्ट्र के विभिन्न समुदायों के बीच कटुता और घृणा फैलाने वाले सबसे बुनियादी ढांचे- जाति- पर प्रहार करके वे भारत की हजारों जातियों में बंटे लोगों को नागरिक बनाने का महान काम कर रहे थे.
वे स्त्रियों के अधिकारों को समाज में बदलाव के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं. संविधान सभा में उनके राष्ट्र संबंधी विचार पूरी तरह निखरकर सामने आते हैं. यहां वे किसी समुदाय के नहीं, समग्र राष्ट्र के नेता और विचारक हैं. इन्हीं वजह से समाजशास्त्री प्रोफेसर विवेक कुमार बाबासाहेब को ‘राष्ट्र निर्माता’ कहते हैं.आप पायेंगे कि बाबासाहेब अपनी एकमात्र पहचान भारतीय के रूप में बताते हैं.
यही उनकी पहली और आखिरी पहचान है. वे नहीं मानते कि किसी आधुनिक लोकतंत्र में व्यक्ति की कोई आदिम पहचान होनी चाहिए. खासकर ऐसी पहचान जो नागरिकों के बीच जन्म के आधार पर भेद पैदा करती है. उनके सपनों में राष्ट्र का हर नागरिक है. इसलिए वे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों और महिलाओं के हितों को लेकर भी चिंतित हैं और उनके लिए काम करने की कोशिश करते हैं.
वे श्रमिकों के अधिकारों को लेकर भी समान रूप से चिंतित हैं. इन तमाम रूपों में नजर आ रहे आंबेडकर अपनी समग्रता में एक ऐसे विचारक के रूप में नजर आते हैं, जो भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, जहां भाईचारा हो और भेदभाव न हो.
अपने इस उद्देश्य को हिंदू धर्म की सीमाओं में पूरा न होता देख कर ही 1936 में हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा करते हैं. वर्ष 1956 में वे बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेते हैं.
यह उनके लिए मुक्ति का मार्ग है. इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए वे समाजवादी चिंतक और राजनेता राम मनोहर लोहिया के साथ संवाद कायम करने की कोशिश करते हैं. दोनों नेताओं के बीच संवाद शुरू भी होता है, जो बाबासाहेब के परिनिर्वाण के कारण पूरा नहीं हो पाता. यहां भी बाबासाहेब आधुनिक भारत का सपना पूरा करने के अपने प्रोजेक्ट में ही जुटे नजर आते हैं.
महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने को संघर्ष
आंबेडकर आधुनिकता, लोकतंत्र और न्याय की संतान थे. वे पेशे से वकील भी थे. मनुष्य की गरिमा को बराबरी दिये बिना वे आधुनिकता, लोकतंत्र और न्याय की कल्पना भी नहीं कर सकते थे. उन्होंने भारतीय समाज में घर और बाहर-दोनों जगह महिलाओं की बराबरी के लिए संघर्ष किये.
जब वे जवाहरलाल नेहरू की सरकार में विधि मंत्री बने, तो उन्होंने महिलाओं को न केवल घरेलू दुनिया में, बल्कि उन्हें आर्थिक और लैंगिक रूप से मजबूत बनाने के लिए हिंदू कोड बिल प्रस्तुत किया. यह बिल पास नहीं होने दिया गया. आंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया. हमें इसे जानना चाहिए कि यह बिल क्यों पास नही होने दिया गया? यदि हम यह जान सकें, तो अपने आपको न्याय की उस भावना के प्रति समर्पित कर पायेंगे, जिसका सपना डाॅक्टर भीमराव आंबेडकर ने देखा था.
आर्थिक विषयों में उनका योगदान
अर्थशास्त्र आंबेडकर का सर्वाधिक प्रिय विषय था. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय उनके पास कुल 29 विषय ऐसे थे, जिनका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से था. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान की चर्चा करने से पहले एक घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा.
1930 का दशक दुनियाभर के बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था. ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं, खासकर उपनिवेशों में जहां आजादी की मांग जोर पकड़ती जा रही थी, वहां औपनिवेशिक सरकार की पकड़ को बनाये रखने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान आवश्यक था.
अगस्त, 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था. इस आयोग की बैठक में आंबेडकर भी थे. वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए, तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं. उस आयोग की रिपोर्ट की अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई.
इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राॅब्लम ऑफ रुपया’ पर आधारित है. उस समय तक उनका मुख्य लेखन अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय को लेकर ही था. मात्र 27 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंबई के एक कॉलेज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी मिल चुकी थी. अध्यापन के अलावा वे विषय से संबंधित सैकड़ों लेख और व्याख्यान दे चुके थे. (ओमप्रकाश कश्यप के ब्लॉग आखरमाला से संपादित अंश, साभार)
