बैंक चलाना सरकार का काम नहीं

सरकारी बैंकों का निजीकरण होना चाहिए, नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की इस बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूं. पनगढ़िया एक अच्छे अर्थशास्त्री हैं और बैंकिंग व्यवस्था को वे अच्छी तरह से समझते हैं. जहां तक मैं समझता हूं कि एक सरकार को अपनी सरकार चलानी चाहिए, न कि उसे बैंक […]

सरकारी बैंकों का निजीकरण होना चाहिए, नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की इस बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूं. पनगढ़िया एक अच्छे अर्थशास्त्री हैं और बैंकिंग व्यवस्था को वे अच्छी तरह से समझते हैं. जहां तक मैं समझता हूं कि एक सरकार को अपनी सरकार चलानी चाहिए, न कि उसे बैंक चलाने का काम करना चाहिए. इसके नुकसान होते हैं.

सरकार का काम बैंक चलाना नहीं होना चाहिए. हां, वह बैंकों को रेगुलेट करने का काम कर सकती है. इसे इस तरह से समझिए. जिस तरह से क्रिकेट के खेल में खेल को अच्छी तरह से संचालित करने का काम अंपायर का होता है और खेलने का काम खिलाड़ियों का, ठीक उसी तरह से सरकार को अंपायर की भूमिका में होना चाहिए और बैंकों को खिलाड़ियों की भूमिका में होना चाहिए.

हमेशा तो यह खबर आती रहती है कि बैंकों का पुनर्पूंजीकरण (रिकैपिटलाइजेशन) करने में सरकार ने हजारों करोड़ लगा दिये. सरकार के लिए यह घाटा हुआ. सरकार इस घाटे की भरपाई हमारे टैक्स से करती है. अगर बैंकों का निजीकरण कर दिया जाये, तो इस घाटे से सरकार बच सकती है.

वर्तमान में सरकारी बैंकों में एनपीए की समस्या बहुत विकराल है. आज हमारे बैंक बहुत क्राइसिस में हैं और हमें इसे समझने की जरूरत है. आजकल जो बड़े-बड़े पूंजीपति बैंकों का पैसा लेकर देश से चले जा रहे हैं, यह उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी की एनपीए है. यह एनपीए क्या है? नेताओं के चलते औद्योगिक घरानों को सरकारी बैंकों से लोन मिल जाते हैं.
और जब इस लोन की ईएमआई नहीं भरी जाती है, तब यह लोन एकाउंट ही एनपीए कहा जाता है. सरकारी बैंक इस लोन को वसूलने में नाकाम हो जाते हैं, क्योंकि उन पर राजनीतिक दबाव होता है. औद्योगिक घराने, पूंजीपतियों और नेताओं के बीच एक प्रकार का ‘पॉलिटिकल नेक्सस’ काम करता है. लेकिन अगर सरकारी बैंकों का निजीकरण कर दिया जाये, तो यह नेक्सस टूट जायेगा और बैंक इतनी आसानी से किसी को बड़ा लोन नहीं देंगे. न ही बैंकों पर लोन देने का कोई राजनीतिक दबाव रहेगा.
इसलिए मेरा मानना है कि यही वह समय है, जब बैंकों का भविष्य बदलने की हमें कोशिश करनी चाहिए. बैंकों की हालत आज जितनी खराब है, उसे देखते हुए निजीकरण ही इसका बेहतर उपाय है. जो लोग यह सोचते हैं कि सरकारी बैंकों का रहना जरूरी है, क्योंकि यह गरीबों के काम आता है, तो सबसे पहले तो उन्हें यह सोचना चाहिए कि आखिर हम पहले गरीबी खत्म करने की कोशिश क्यों नहीं करते. इसके अलावा भी बैंक के निजीकरण से अनेक और भी फायदे हैं, जिनका अच्छी तरह से मूल्यांकन करके इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहिए.

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