नयी दिल्ली : वित्त मंत्री अरुण जेटली आज यानी बुधवारको विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की पूजा के दिन संसद में बजट पेश करेंगे. उनके द्वारा पेश किया जाने वाला सालाना आम बजट आज 71 साल पुराने भारतीय बजट की परंपरा को बदलकर रख देगा. वहीं, आज ही पहली बार ऐसा होगा, जब संसद में अलग से रेल बजट पेश नहीं किया जायेगा, यानी यह इतिहास बन जायेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी एनडीए की सरकार अलग से पेश होने वाले रेल बजट को आज पहली बार आम बजट में समाहित करके संसद में पेश करेगी. इतिहास बनाये ही जाते हैं, पर इतिहास बनने के लिए ही. आज भी बीते 71 साल से भारत में पेश किया जा रहा सोशलिस्ट बजट इतिहास बन जायेगा और साथ ही इतिहास की गर्त में खो जायेगा अलग से पेश किया जाने वाला रेल बजट. आइये जानते हैं, भारत में 93 साल से अलग से पेश किये जाने वाले रेल बजट और 71 साल से पेश किये जाने वाले आम बजट का इतिहास.
आज से 93 साल पहले वर्ष 1924 में पेश किया गया था देश का पहला रेल बजट
भारत में रेल बजट को अलग से पेश करने की परंपरा 1924 से शुरू हुई थी. आजादी के बाद भी यह परंपरा चलती रही, जबकि अलग रेल बजट की कोई संवैधानिक विवशता नहीं है. नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से योजना आयोग को समाप्त कर बनाये गये नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय और किशोर देसाई की कमेटी ने रेल बजट खत्म करने की सिफारिश की थी. बजट शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के ‘बॉजेट’ से हुई है, जिसका अर्थ होता है चमड़े का बटुआ. बजट के जरिये सरकार अगले साल के आय-व्यय का ब्योरा पेश करती है. वर्ष 2000 तक आम बजट शाम 5 बजे पेश होता था, लेकिन वाजपेयी सरकार के वक्त इसे बदला गया और उस समय के वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने इसे 11 बजे पेश करना शुरू किया था.
जेम्स विल्सन थे भारतीय बजट के संस्थापक
जेम्स विल्सन को भारतीय बजट का संस्थापक कहते हैं. भारत का पहला बजट 18 फरवरी, 1860 को वायसराय की परिषद में जेम्स विल्सन ने पेश किया था. स्वतंत्र भारत का पहला बजट तत्कालीन वित्तमंत्री आरके षणमुखम चेट्टी ने 26 नवंबर, 1947 को पेश किया था. पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री के साथ वित्तमंत्री भी रहते हुए बजट पेश किये थे. नेहरू ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने बजट पेश किया था. भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा बजट पेश करने का रिकॉर्ड वित्तमंत्री मोरारजी देसाई के नाम है, वित्तमंत्री रहते हुए उन्होंने 10 बार बजट पेश किया था. मोरारजी देसाई के बाद अगर किसी का नाम आता है, तो वे हैं पी चिदंबरम, जिन्होंने सबसे अधिक नौ बार बजट पेश किया है.
1946 में पेश किया गया था भारत का पहला सोशलिस्ट बजट
भारतीय बजट के इतिहास में हमेशा इस बात की चर्चा की जाती है कि वर्ष 1946 में पहली दफा भारत में पहली बार सोशलिस्ट बजट पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री लियाकत अली ने बजट पेश किया था. हालांकि, इस बजट को पेश करने के डेढ़ साल बाद उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया गया था. बीबीसी में प्रकाशित भारतीय बजट के इतिहास के अनुसार, सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित अंतरिम सरकार के वित्त मंत्री लियाकत अली खान ने दो फरवरी को बजट पेश किया, उसी इमारत में जिसे आज संसद भवन कहा जाता है. लियाकत अली खान मोहम्मद अली जिन्ना के खासमखास थे. अंतरिम प्रधानमंत्री नेहरू की कैबिनेट में सरदार पटेल, भीमराव अंबेडकर, बाबू जगजीवन राम सरीखे दिग्गज भी थे.
लियाकत अली के सोशलिस्ट बजट को उद्योगपतियों ने बताया था कठोर
बीबीसी की खबर के अनुसार, लियाकत अली बंटवारे से पहले मेरठ और मुजफ्फरनगर से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनाव भी लड़ते थे, वैसे उनका संबंध करनाल के राज परिवार से था. वे जिन्ना के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के सबसे बड़े नेता माने जाते थे. जब अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तो मुस्लिम लीग ने उन्हें अपने नुमाइंदे के रूप में भेजा. उन्हें पंडित नेहरू ने उस समय वित्त मंत्रालय सौंपा था. लियाकत खान ने अपने बजट प्रस्तावों को ‘सोशलिस्ट बजट’ बताया पर उनके बजट से देश की इंडस्ट्री ने काफी नाराजगी जतायी. लियाकत अली खान पर आरोप लगा कि उन्होंने कर प्रस्ताव बहुत ही कठोर रखे, जिससे कारोबारियों के हितों को चोट पहुंची.
कॉरपोरेट टैक्स को कर दिया था दोगुना
बीबीसी यह भी लिखता है कि सोशलिस्ट बजट पेश करने के बाद लियाकत अली पर यह भी आरोप लगा था कि उन्होंने एक प्रकार से हिंदू विरोधी बजट पेश किया है. उन्होंने व्यापारियों पर एक लाख रुपए के कुल मुनाफे पर 25 फीसदी टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा था और कॉरपोरेट टैक्स को दोगुना कर दिया था. अपने विवादास्पद बजट प्रस्तावों में लियाकत अली खान ने टैक्स चोरी करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के इरादे से एक आयोग बनाने का भी वादा किया. कांग्रेस में सोशलिस्ट मन के नेताओं ने इन प्रस्तावों का समर्थन किया. पर सरदार पटेल की राय थी कि लियाकत अली खान घनश्याम दास बिड़ला, जमनालाल बजाज और वालचंद जैसे हिंदू व्यापारियों के खिलाफ सोची-समझी रणनीति के तहत कार्रवाई कर रहे हैं. ये सभी उद्योगपति कांग्रेस से जुड़े थे.
