प्रकाश के रे
ऐसा कभी-कभार ही होता है कि बॉलीवुड की किसी फिल्म पर लोकवृत्त में व्यापक चर्चा भी होती हो और वह टिकट खिड़की पर भी कमाई करती हो. निर्देशक अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’ ऐसी ही फिल्म है.
इसमें समाज के दलित और वंचित तबके के शोषण और संघर्ष की समकालीन कहानी है. हमारे दौर की एक विडंबना है कि परंपरागत और नये मीडिया तथा राजनीतिक, न्यायिक और सामाजिक हलचलों के बड़े विस्तार के बावजूद भी राष्ट्र, धर्म, जाति, भाषा और जेंडर से जुड़े मसलों पर मुख्यधारा में बेलाग और बेबाक बतकही की गुंजाइश कम होती जा रही है. ऐसे में जाति, जातिवाद और जातिगत समस्याओं को रेखांकित कर अनुभव सिन्हा ने एक महत्वपूर्ण और आवश्यक हस्तक्षेप किया है.
निर्देशक के साथ हिंदी साहित्य के चर्चित युवा हस्ताक्षर गौरव सोलंकी ने इस फिल्म को लिखा है. भाषा और संवाद के स्तर पर विषय की जटिलताओं की प्रभावी प्रस्तुति जहां इस फिल्म की खूबी है, वहीं इवान मुलीगन के कैमरे से हमारे समाज के कड़वे सच को देखना अपने समय के चारों ओर आईना रखने जैसा है. फिल्म मेलोड्रामा की परंपरा में तो है, पर सुधार के लिए उपदेशात्मक होने और मुश्किलों की ओर ध्यान खींचने के लिए शोर मचाने की ग्रंथि से बचती भी है.
यह भी उल्लेखनीय है कि निर्देशक को अपने काम के मतलब और उसकी अहमियत का पूरा अंदाजा है, इसलिए वह ‘अब फर्क लायेंगे’ का दावा भी कर देता है. लेकिन यह दावा उस भरोसे का हामी है कि देश के लोगों के अपनेपन और साझेदारी से देश बनता है. यह भरोसा फिल्म को मिल रही कामयाबी और सराहना से पुख्ता होता है.
बाबा साहेब आंबेडकर ने दशकों पहले कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र बगैर सामाजिक लोकतंत्र के आधार के स्थायी नहीं हो सकता है.
इसे हासिल करने के लिए हमारे संविधान में समता के अधिकार के रूप में एक बुनियादी अधिकार दर्ज किया गया है. फिल्म ‘आर्टिकल 15’ एक ओर दलित समुदाय की वंचना के साथ उसके भीतर से उठ रही आकांक्षाओं तथा संघर्ष की धाराओं को सामने लाती है, तो वहीं दूसरी तरफ समाज में जातिवादी मानसिकता की संकीर्णताओं की परतें भी उघारती है.
फिल्म का संदेश स्पष्ट है- अगर हम भारत को महान बनाना चाहते हैं, तो समानता के आदर्शों के अनुरूप हमें एक-दूसरे का हाथ थामना होगा, अन्याय का प्रतिकार करना होगा और इस प्रयास में संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार शासन व समाज को हिस्सेदार होना होगा. सत्तर-अस्सी के दशकों के समांतर सिनेमा और गिनी-चुनी ‘बंबइया’ फिल्मों को छोड़ दें, तो हिंदी सिनेमा में जाति-आधारित शोषण और भेदभाव को मुख्य विषय बनाने का चलन नहीं रहा है. वंचित तबकों के किरदार भी लगभग अनुपस्थित होते हैं.
अनुभव सिन्हा ने इस फिल्म को ग्लैमर और गानों के चालू चलन से भी मुक्त रखा है. असली लोकेशन में अपने-अपने किरदार में डूबे कलाकारों ने एक फिल्म को एक ईमानदार फिल्म बनाने में अद्भुत योगदान किया है. चूंकि फिल्में बनाना एक महंगा कारोबार भी है, तो फिल्मकारों के लिए ‘फॉर्मूला’ से डिगना आसान भी नहीं होता.
ऐसे में अनुभव सिन्हा ने ‘आर्टिकल 15’ बनाकर एक मिसाल कायम की है और इससे उनके जैसे अन्य स्थापित निर्माता-निर्देशकों को भी जरूरी मुद्दों पर फिल्में बनाने का हौसला मिलने की उम्मीद है. यह भी कहा जाना चाहिए कि उन्होंने ऐसा लगातार दूसरी बार किया है. पिछले साल आयी सांप्रदायिकता और मुस्लिम समाज के विलगन पर उनकी फिल्म ‘मुल्क’ भी खासा कामयाब रही थी.
अन्य रचनात्मक विधाओं और कलात्मक अभिव्यक्तियों की तरह सिनेमा का भी एक सामाजिक दायित्व है, लेकिन हम उससे समाधान का आग्रह नहीं रख सकते. यह काम राजनीति और समाज का है. सिनेमा, साहित्य और गीत-संगीत उसमें सहयोगी हो सकते हैं. ‘आर्टिकल 15’ ऐसी ही एक कोशिश है.
