।। ब्रह्मानंद मिश्र ।।
दुनियाभर में विभिन्न कारणों से हर साल लाखों लोगों का आशियाना उजड़ जाता है और वे अपनी जड़ों से विस्थापित हो जाते हैं. दुनिया में इस वक्त ऐसे लोगों की संख्या चार करोड़ से अधिक है. कल यानी 20 जून को ‘विश्व शरणार्थी दिवस’ है. इस मौके पर आज के नॉलेज में दुनियाभर में शरणार्थियों की स्थिति और उनसे पैदा होनेवाली चुनौतियों व अन्य कई पहलुओं को फोकस किया गया है.
वि स्थापन ऐसी त्रसदी है, जो इंसान से रोटी, कपड़ा और मकान, सब कुछ एक साथ छीन लेती है और जिंदगी की जद्दोजहद को बेहद मुश्किल बना देती है. यह स्थिति बेहद दुखद है कि दुनिया में प्रति मिनट आठ लोग प्राकृतिक आपदा या अत्याचार, उग्रवाद जैसी मानवजनित आपदाओं की वजह से बेघर हो जाते हैं या उन्हें इसके लिए मजबूर कर दिया जाता है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, विरोध (विद्रोह, गृह युद्ध, सांप्रदायिक उन्माद, आपसी टकराव आदि) और अत्याचारों की वजह से दुनियाभर में चार करोड़ 33 लाख लोग शरणार्थी जीवन जीने को मजबूर हैं. शरणार्थियों की समस्याओं का संज्ञान लेते हुए 1950 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा यूनाइटेड नेशन्स हाइ कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (यूएनएचसीआर) की स्थापना की गयी.
विस्थापन : वैश्विक समस्या
विस्थापन किसी देश या क्षेत्र विशेष की समस्या नहीं है. दुनिया के कई देशों में हो रहा विस्थापन चिंता का विषय बनता जा रहा है. इस घटनाक्रम में सोमालिया और अफगानिस्तान दो दुखद अध्याय हैं. दोनों देशों में वर्षो से जारी अंतहीन विरोध लाखों लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर कर रहा है. इस वजह से इन देशों में शरणार्थियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. ये शरणार्थी पूरी दुनिया में फैल रहे हैं. आज की तारीख में अफगानी शरणार्थी 71 देशों में देखे जा सकते हैं.
2009 में सोमालियाई शरणार्थियों ने कम से कम 34 देशों में आश्रय के लिए गुहार लगायी थी. अपने परिवार समेत जानमाल की रक्षा और बेहतर जिंदगी की तलाश में देश की सीमाओं को लांघ कर नयी उम्मीदें लिये दूसरे देशों में पहुंचने का सिलसिला आज भी जारी है. निश्चित तौर पर इतनी बड़ी संख्या में हो रहा पलायन और जिंदगी के लिए शरणार्थियों की जद्दोजहद 21वीं सदी में सबसे बड़ी चिंता का विषय है.
कैसे-कैसे विस्थापित
शरणार्थी : संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन, 1951 के अनुसार, अपना घर और देश छोड़नेवाले ऐसे लोग, जिनमें जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी सामाजिक संस्था की सदस्यता या राजनीतिक मतभेद की वजह से भय कायम रहता है, उन्हें शरणार्थी माना जाता है. ज्यादातर शरणार्थी प्राकृतिक और मानवजनित आपदा की वजह से पलायन करते हैं. विश्व के तकरीबन एक-चौथाई शरणार्थी विकासशील देशों से होते हैं. इनमें 23 लाख शरणार्थी 48 अल्प-विकासशील देशों से संबंध रखनेवाले हैं.
आश्रय चाहनेवाले (असाइलम सीकर) : ऐसे लोग जो किसी अन्य देश में शरण पाने के लिए वहां की सरकार से गुहार लगाते हैं. ये लोग उस देश में प्रवास के लिए मान्यता मिलने के इंतजार में रहते हैं. हालांकि ऐसे लोगों को शरणार्थियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है.
आंतरिक विस्थापित : संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, ऐसे लोग जिन्हें किसी देश में अन्य देशवासियों की तरह नागरिक अधिकार हासिल नहीं होते हैं. ऐसे लोग प्राकृतिक आपदा या अन्य किन्हीं कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित हो जाते हैं. हालांकि, ये लोग अपने देश की सीमा के भीतर ही रहते हैं.
स्टेटलेस पर्सन : ऐसे लोग जिनके पास किसी देश की मान्यता प्राप्त नागरिकता नहीं होती है. ऐसी दशा, किसी वर्ग समूह के साथ भेदभाव की वजह से उत्पन्न होती है. ऐसे लोगों को किसी देश की नागरिकता या पहचान नहीं होने की वजह से सरकारी सेवाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार आदि) से वंचित होना पड़ता है.
बेघरों को मदद की चुनौती
जिंदगी की दुश्वारियों का सामना कर रहे लाखों-करोड़ों लोगों की मदद कर पाना भी बेहद कठिन काम है. छह दशकों से संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियां- यूएन हाइ कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (यूएनएचसीआर) और यूएन रिलीफ एंड वर्क्स एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए)- लाखों शरणार्थियों को सुरक्षा और मदद मुहैया करा रही हैं. यूएनएचसीआर दुनियाभर में एक करोड़ से ज्यादा शरणार्थियों की देखभाल कर रही है, जबकि यूएनआरडब्ल्यू जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और फिलिस्तीन अधिकृत क्षेत्र में 48 लाख शरणार्थियों की देखभाल में जुटी हुई है.
दूसरी ओर, कई देशों में हो रहे आंतरिक विरोधों और उत्पन्न हुई विषम परिस्थितियों ने लाखों नागरिकों को विस्थापन के लिए मजबूर कर दिया है. हालांकि, इसकी जिम्मेवारी वहां की सरकारों की होती है, लेकिन सरकारें आमतौर पर विस्थापन रोक पाने में या तो अक्षम होती हैं या मदद की जिम्मेवारी नहीं लेती हैं. यूएनएचसीआर केंद्रीय भूमिका निभाते हुए सोमालिया और कांगो समेत कई देशों में लगातार प्रयासरत है, लेकिन समस्याएं अभी भी जटिल बनी हुई हैं.
तीन सबसे बड़ी चुनौतियां
विश्व के 120 देशों में करोड़ों की संख्या में फैले शरणार्थियों की सामान्य जिंदगी को पटरी पर वापस लाने के लिए मुख्य रूप से तीन चुनौतियां हैं. यूएन हाइ कमिश्नर एंटोनियो गुटेर्स के अनुसार, स्थितियां अनुकूल होने पर घर वापसी, अगर वापसी संभव नहीं है, तो उनकी अलग से व्यवस्था. दोनों स्थितियां यदि संभव नहीं हैं, तो तीसरे देश में ही पुनर्वास की व्यवस्था से हल निकालने की कोशिश की जा सकती है. संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि पहली चुनौती हाल के वर्षो में तेजी से बढ़े विरोध की वजह से है. कुछ स्थानों पर ऐसा माहौल दशकों से बना हुआ है, जिसकी वजह से लाखों शरणार्थी पांच वर्ष से अधिक से बेघर हैं.
पिछले एक दशक के आंकड़ों पर गौर करें, तो केवल एक-चौथाई ही शरणार्थी प्रतिवर्ष लौटते हैं. 2009 में तकरीबन ढाई लाख शरणार्थी घर लौटे थे. अल्प विकसित देशों या विकासशील देशों में बढ़ रही शरणार्थियों की समस्याओं के समाधान में कुछ विकसित देश सहयोगी की भूमिका निभा सकते हैं. यूएनएचसीआर के इस प्रस्ताव को 25 विक सित देश मानने को तैयार तो हुए, पर सभी मिलकर महज 10 प्रतिशत शरणार्थियों के पुनर्वास की व्यवस्था कर पाये हैं. 2009 में पुनर्वासित 84,000 शरणार्थियों की संख्या मौजूदा शरणार्थियों की संख्या से एक प्रतिशत से भी कम है.
दूसरी चुनौती, शरणार्थियों की सहायता में लगे मानवतावादी कार्यकर्ताओं के खिलाफ बन रहे माहौल से निबटने की है. चरमपंथी संगठनों द्वारा इंसानियत के खिलाफ मुहिम चिंता का विषय है. विस्थापितों की सेवा में लगे इन कार्यकर्ताओं पर हमले की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं. ऐसे में पीड़ितों को मदद मुहैया कराना बेहद मुश्किल काम है. 2009 में यूएनएचसीआर के तीन कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गयी थी और एक का अपहरण किये जाने का मामला प्रकाश में आया था. हाल में सूडान में यूएनएचसीआर के स्टाफ मेंबर की हत्या का मामला सामने आया था. शरणार्थियों की मदद में लगे यूएनएचसीआर के 40 सदस्यों की अब तक हत्या हो चुकी है.
तीसरी समस्या, विस्थापितों को आश्रय देनेवाली संस्थाओं की घटती संख्या है. ऐसी समस्याएं ज्यादातर औद्योगीकृत देशों में है, जहां विस्थापित, आश्रय चाहनेवाले लोग और शरणार्थियों की स्थिति लगभग एक जैसी है.
मानवाधिकार सबके लिए
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हर व्यक्ति को अपने मानवाधिकार की रक्षा करने का हक है. शरणार्थी, आश्रय चाहनेवाले और विस्थापित विषम परिस्थितियों में भी अपने इस अधिकार से वंचित नहीं होते. बावजूद इसके इनके अधिकारों का हनन हो रहा है. दुनिया के किसी कोने में ऐसे लोग न्याय और अधिकार पाने के हकदार हैं. दुनिया के कई समृद्ध देशों में कागजात पूरा नहीं होने पर महिलाओं और बच्चों को भी हफ्तों, महीनों के लिए हिरासत में लिया जाता है, लेकिन आश्रय के आवेदन पर उन्हें छूट मिल सकती है.
मौलिक मानवाधिकार के सिद्धांतों के तहत लोगों को उस देश में कतई नहीं वापस किया जा सकता है, जहां के हालात विषम हों और जीवन-यापन बेहद मुश्किल हो. कानूनी प्रावधान के तहत पीड़ितों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा मुहैया करायी जाती है. कुछ देशों के नागरिकों में विस्थापित और शरणार्थियों के प्रति नकारात्मक मानसिकता दिखती है. कई बार वहां के राजनेताओं द्वारा ऐसी घटनाओं के लिए उकसाया जाता है.
अन्य मददगार संस्थाएं
मानव जाति के लिए चुनौतियां दिन-प्रतिदिन जटिल होती जा रही हैं. यूनाइटेड नेशंस हाइ कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी के अलावा दुनियाभर की कई अन्य संस्थाएं भी शरणार्थियों और विस्थापितों की मदद के लिए आगे आ रही हैं. संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्थाएं वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (डब्ल्यूएफपी), यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रेन फंड (यूनिसेफ), वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ), यूएन डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी), ऑफिसर्स फॉर द कोऑर्डिनेशन ऑफ ह्यूमेनीटेरियन अफेयर्स (ओसीएचए) और यूनाइटेड नेशंस हाइ कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स (ओएचसीएचआर) अपनी सेवाएं दे रही हैं. इसके अलावा, इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (आइसीआरसी), इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज (आइएफआरसी), इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आइओएम) के अलावा 640 एनजीओ भी इस क्षेत्र में कार्यरत हैं.
विश्व शरणार्थी दिवस
20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस के मौके पर यूएनएचसीआर ने दुनियाभर में ऐसे लाखों लोगों से धैर्य रखने और अपने घरों को वापसी करने की अपील की है, जो हिंसा और मानवाधिकारों के हनन के चलते पलायन कर गये हैं. पिछले वर्ष काफी संख्या में लोगों ने वापसी की थी. इस वर्ष यूएनएचसीआर ने ऐसे परिवारों को मदद देने और शरणार्थियों की कहानियों को साझा करने की अपील की है. इसके अलावा, 13 भाषाओं में एक वीडियो संदेश ‘लेट मी टेल यू ए स्टोरी-द मोस्ट अर्जेट स्टोरी ऑफ योर टाइम’ भी रिकॉर्ड किया गया है. विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा दुनियाभर में शरणार्थियों के प्रति समर्थन और जागरूकता के लिए इसे प्रसारित किया जा रहा है.
कार्यक्रमों से जागरूकता का प्रयास
यूएनएचसीआर शरणार्थियों की मदद में लगे लोगों और संस्थाओं के लिए प्रतिवर्ष कई कार्यक्रमों को आयोजित करता है. पहली बार विश्व शरणार्थी दिवस सन् 2001 में मनाया गया था. प्रत्येक वर्ष दुनियाभर में लाखों लोग 20 जून को विस्थापितों के लिए अपना समर्थन देते हुए सौहाद्र्र की अपील करते हैं. 100 से अधिक देशों में सरकारी संस्थाएं, मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रतिष्ठित लोग विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से दुनिया को आपसी सद्भाव और शांति का संदेश देते हैं.
नानसेन पुरस्कार : शरणार्थियों की सेवा में सराहनीय योगदान देनेवाली संस्था या इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य करने वाले को व्यक्तिगत तौर पर प्रतिवर्ष ‘नानसेन पुरस्कार’ दिया जाता है. नार्वे के फ्रिटजोफ नानसेन को 1921 में शरणार्थियों की सहायता के लिए लीग ऑफ नेशंस द्वारा पहला हाइ कमिश्नर नियुक्त किया गया था. एक लाख अमेरिकी डॉलर राशि का यह पुरस्कार प्रतिवर्ष अक्तूबर माह में दिया जाता है.
पिछले साल बेहतर काम : 2013 में यूएनएचसीआर ने अभूतपूर्व कार्य किया. हाल के वर्षो में सीरिया में विद्रोह, मध्य अफ्रीकी गणराज्य और दक्षिणी सूडान सहित दुनिया के तमाम इलाकों में गतिरोध के बावजूद यूएनएचसीआर ने शरणार्थियों के लिए बेमिसाल काम किया है.
इस वर्ष की थीम : 2014 में कार्यक्रम को विस्तार देते हुए शरणार्थियों को व्यक्तिगत रूप से लोगों को अपनी साहसिक कहानियों को सभी से साझा करने का मौका दिया जा रहा है.
हिंसा की वजह से लाखों लोग हमेशा के लिए अपनी जड़ों से कट रहे हैं. ऐसे लोगों को मदद और सुरक्षा देने में हमें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. यह देखना भी काफी दुखद है कि बड़े पैमाने पर परिवार और समुदाय बिखर रहे हैं. इसे रोकने और विवादों को सुलझाने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है. यूएनएचसीआर के समर्थक मुश्किलों का सामना कर रहे शरणार्थियों की कहानियों को साझा कर रहे हैं, लेकिन हमें और अधिक साहस दिखाने की जरूरत है.
-एंटोनियो गुटेर्स, यूएन हाइ कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी
