हमारी यह उम्मीद व्यर्थ है कि बच्चे कोई भी बात एक बार में ही समझ जायेंगे, हमेशा अनुशासन में रहेंगे. पाबंदी में रहना जब हमें अच्छा नहीं लगता, तो उन्हें कैसे लगेगा? कभी-कभी उन्हें अपने अनुसार जीने के लिए छोड़ देना चाहिए. उन्हें स्वच्छंद उड़ान भरने देना चाहिए.
शारदा देवी ने कहा कि तुम सबको जिन बातों की उम्मीद बच्चों से है, उन्हें सबसे पहले अपने अंदर विकसित करो. जो गेम तुम लोगों को बच्चोंवाला लग रहा था, वह भी तुम पूरा नहीं कर सकीं, तो यह उम्मीद बच्चों से कैसे हो सकती है कि वे उसे पूरा करेंगे. जरा-सी टेंशन में तुम सब चिल्लाने लगीं, यहां तक कि आपस का लिहाज, बड़े-छोटे का फर्क भूल गयीं, तो बच्चों को दोष किसलिए? जरा-सा शोर क्या मचा, तुम लोगों की सहनशीलता जवाब दे गयी. नौबत लड़ाई-झगड़े तक पहुंच गयी.
किस तरह से एक-दूसरे को बोल रही थीं? तुम लोग पूछ रही थीं न कि मैं इस गेम से साबित क्या करना चाहती हूं? तो मैंने साबित कर दिया कि हम लोग जिस समझदारी की उम्मीद बच्चों से लगाते हैं, वह व्यर्थ है. जब हम बड़े होकर भी बच्चों जैसा बिहेव कर सकते हैं, तो वे तो बच्चे ही हैं. जो बातें हमारे लिए सहज नहीं, वे बच्चों के लिए कैसे आसान होंगी? तुम लोगों को बच्चों से क्यों इतनी उम्मीद है कि वे तुम्हारी बात एक बार में ही समझ जायेंगे. हमेशा, हर जगह अनुशासन में रहेंगे. हमेशा पाबंदी में रहना किसी को भी नहीं अच्छा लगता, तो उन्हें कैसे लगेगा? बच्चों को कभी तो खुल कर खेलने दो. स्वच्छंद उड़ान उड़ने दो.
यही गेम बच्चों को खेलाया होता, तो वे तुम लोगों से बेहतर करते. थोड़ा भी गलत होता, तो बेचारों को सुनने को मिलता कि दिमाग में गोबर भरा है. एक बार कहने पर समझ नहीं आता. जब कहा जा रहा है कि सर्किल की बायीं तरफ, तो दायीं तरफ क्यों बनाया? स्कूल में क्या सीखा है जब बायें-दायें का भी नहीं पता? स्कूल में क्या टीचर बड़ों का सम्मान करना नहीं सिखाते? उन्होंने तुम्हें शेप्स भी नहीं सिखाये जो पेंटागन और हेक्सागन नहीं बना पाये? बच्चों को बार-बार यह सुनाना कि अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हो फिर नंबर कम कैसे आये? दस में से एक नंबर भी कम हुआ कि बच्चा सारा दिन डांट खाता है.
क्या कभी उसकी परेशानी समझी है? उसे कहां दिक्कत आ रही है, यह जानने की कोशिश की है? कभी-कभी सब कुछ जानते-समझते हुए भी गलती हो जाती है, तो उसका इतना बड़ा इशू नहीं बनाना चाहिए. बहुत सारी चीजें जब हम नहीं समझ पाते, तो बच्चों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे सही-सही समङोंगे और करेंगे? बच्चों को सुनाने में तुम लोग देरी नहीं करती मगर जब खुद प्रैक्टिकल करना पड़ा तो समझ आया न कि जो चीज दिखने में आसान लगती है, दरअसल वह उतनी आसान होती नहीं.
मेरे कहने का, समझाने का और इस गेम का यही मतलब था. मैंने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया कि ये बातें तुम सबके सामने ला सकूं और तुमको समझा सकूं. सभी महिलाएं बहुत सीरियस थीं. सबको चुप देख कर सीमा ने कहा- मैं माफी चाहती हूं कि मैंने नंदा दी से मिस बिहेव किया. मेरा इरादा उन्हें हर्ट करने का नहीं था मगर शायद गलती मेरी ही थी जो ठीक से समझा नहीं पायी और मुङो लगा कि वे समझ नहीं रही हैं. मुङो गुस्सा आ गया. मुङो उनसे इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी. गुस्से में मैं यह भी भूल गयी कि वे बड़ी हैं. हम गेम खेल रहे हैं और गेम में हार-जीत तो होती रहती है. हम बच्चे नहीं कि बस जीतने के लिए मचल जाएं. उस समय मेरा ध्यान केवल गेम पर था और लग रहा था कि कहीं हार न जाऊं और इसी तनाव में मुझसे गलती हुई. मुङो अब समझ आया कि हमें बच्चों से कितनी उम्मीदें होती हैं. अगर उनसे गलती होती है, तो हम उन्हें कितना डांटते हैं. कभी यह नहीं समझते कि अगर वे गलती करते हैं, तो हमें उन्हें डांटने के बजाय समझाना चाहिए. तभी मेहर ने कहा- अब समझ में आया आंटी जी कि आप हमें क्या बताना चाहती थीं.
मैंने बच्चों से जिस लहजे में बात की और जिन शब्दों का प्रयोग किया मुङो वैसा नहीं करना चाहिए था. मैंने उन्हें इसलिए डांटा था कि आप सबको यह न लगे कि मैंने बच्चों को कुछ नहीं सिखाया, इसीलिए वे जंगली की तरह चिल्ला रहे हैं. सच यह है शायद कि अपने आपको दोष से बचाने के लिए मैं उन पर चिल्लाई थी. मैं भी अपनी गलती मानती हूं और बच्चों से भी सॉरी बोलती हूं. आगे से ध्यान रखूंगी कि पब्लिक प्लेस पर मेरी वजह से वे हर्ट न हों. अब लग रहा है कि हमारी भाषा का उन पर भी असर पड़ेगा. जैसे हम उनसे बोलेंगे, वैसे ही शब्द वे आपस में बोलेंगे. तब हमें वाकई में सुनना पड़ेगा कि बच्चों को हमने कैसे संस्कार दिये हैं?
वीना श्रीवास्तव
लेखिका व कवयित्री
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