सुरक्षा परिषद का विस्तार

जी-20 शिखर बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वर्तमान की वास्तविकताओं को देखते हुए वैश्विक संस्थाओं की संरचना में परिवर्तन की आवश्यकता है.

रूस ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के भारत के दावे का फिर समर्थन किया है. भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने सुरक्षा परिषद में तत्काल सुधार का आह्वान करते हुए कहा है कि संयुक्त राष्ट्र की इस मुख्य इकाई में भारत के होने से संतुलन को बढ़ावा मिलेगा और दुनिया की बहुत बड़ी आबादी, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के देशों, के हितों को वैश्विक मंच पर रखा जा सकेगा. उन्होंने ने यह भी रेखांकित किया है कि जी-20 की अध्यक्षता भारत की उत्कृष्ट बहुपक्षीय कूटनीतिक क्षमता तथा बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच सहमति बनाने की योग्यता का स्पष्ट प्रमाण है. बदलती विश्व व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग भारत समेत अनेक देश लंबे समय से करते रहे हैं. पर पांच स्थायी सदस्यों की आपसी राजनीति और विशिष्टता का बोध सुधार की राह में अवरोध बना हुआ है. हालांकि सभी स्थायी सदस्य कभी-न-कभी भारत की दावेदारी को उचित ठहरा चुके हैं.

कुछ समय पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्थायी सदस्यों को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि सुरक्षा परिषद एक ‘पुराने क्लब’ की तरह है, जिसके सदस्य नये देशों को शामिल नहीं करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनका नियंत्रण कम हो जायेगा. दो वर्षों से रूस-यूक्रेन युद्ध चल रहा है. गाजा हमले को रोकने से इस्राइल बार बार इनकार कर रहा है. पश्चिम एशिया बड़े युद्ध के मुहाने पर है. आज के दौर में दुनिया में लगभग 40 जगहों पर हिंसक संघर्ष चल रहे हैं. इन मामलों में कई बैठकों के बाद भी सुरक्षा परिषद कोई ठोस कार्रवाई तो छोड़ दें, ठोस फैसला करने में भी विफल रहा है. कोरोना महामारी के समय विकसित देशों ने बड़ी मात्रा में वैक्सीन की जमाखोरी की थी. उस संबंध में भी सुरक्षा परिषद कुछ नहीं कर सका था. जी-20 शिखर बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वर्तमान की वास्तविकताओं को देखते हुए वैश्विक संस्थाओं की संरचना में परिवर्तन की आवश्यकता है. उन्होंने सुरक्षा परिषद का उदाहरण देते हुए रेखांकित किया था कि जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी, तब इसके 51 सदस्य थे. आज संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या लगभग 200 है. पर स्थायी सदस्यों की संख्या पांच ही बनी हुई है. हालांकि मौजूदा स्थायी सदस्य विस्तार की जरूरत से सहमति जताते रहे हैं, पर उन्होंने ठोस पहल करने में हिचक दिखायी है. अब समय आ गया है कि विश्व के वर्तमान एवं भविष्य को देखते हुए सुधार प्रक्रिया को गति मिले.

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