डॉ राम मनोहर लोहिया का अटूट रिश्ता झारखंड से भी था , खरसावां गोलीकांड के खिलाफ लड़ी थी लड़ाई

डॉ राममनोहर लोहिया जयंती: आज समाजवादी चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया की 112वीं जयंती है. उनके निधन को 55 वर्ष गुजर गये. लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना विराट और विलक्षण था कि पांच दशक बाद भी उन्हें शिद्दत से याद किया जाता है.

Dr Ram Manohar Lohia 112th Birth Anniversary : आज समाजवादी चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया की 112वीं जयंती है. उनके निधन को बेशक 55 वर्ष गुजर गये, लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना विराट और विलक्षण था कि पांच दशक बाद भी उन्हें शिद्दत से याद किया जाता है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बात हो या फिर गोवा मुक्ति संघर्ष की, डॉ लोहिया ने अप्रतिम भूमिका निभायी.

वे गैर-बराबरी के खिलाफ, नागरिक अधिकारों और समाज के वंचित लोगों के लिए अनथक योद्धा की तरह जीवनपर्यंत संघर्षशील रहे. नेपाल, म्यांमार और तिब्बत में लोकशाही और उनकी खुदमुख्तारी के लिए भी डॉ लोहिया ने अग्रणी भूमिका निभायी. इन्हीं विशेषताओं की वजह से वे समकालीन नेताओं से अलग एक विशिष्ट जननेता के रूप में ख्यातिलब्ध हैं.

पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) से साठ किलोमीटर दूर है खरसावां. आजादी के पांच महीने बाद जब देश नये साल का उत्सव मना रहा था, तब खरसांवा जलियांवाला बाग की तरह गोलीकांड का साक्षी बन रहा था. आजादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन का सिलसिला प्रारंभ हुआ. तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) के दो राजघराने क्रमशः सरायकेला व राज खरसावां में मूलतः ओड़िशा के राजवंशों का 350 वर्षों से ज्यादा का शासन रहा.

राज्यों के पुनर्गठन की कवायद शुरू हुई, तो राज खरसावां व सरायकेला रियासत के विलय का प्रश्न भी उठा. भोगौलिक रूप से ये रियासतें ओड़िशा से जुड़ी थीं, इसलिए तत्कालीन राजाओं ने भाषा, संस्कृति, खान-पान के आधार पर अपने राज्य को ओड़िशा प्रांत में सम्मिलित करने का निर्णय लिया.

इस फैसले के विरुद्ध खरसावां के आदिवासियों ने हाट मैदान में 20 हजार से अधिक की जुटान की. झारखंड आंदोलन के प्रणेता और अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष जयपाल सिंह मुंडा को भी उस सभा में शामिल होना था, लेकिन किसी कारणवश वह शामिल नहीं हुए.

हजारों की भीड़ देख कर ओड़िशा शासन और प्रशासन के होश पाख्ता होने लगे. भीड़ हटाने की उनकी कोशिशें जब कामयाब नहीं हुईं, तो ओड़िशा मिलिट्री फोर्स ने मशीनगनों से बेकसूर आदिवासियों पर गोलियों की बौछार कर दी. करीब दो हजार की संख्या में पुरुष, महिलाएं और बच्चों की मौत हो गयी. इस पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ डॉ राममनोहर लोहिया और जयपाल सिंह मुंडा को छोड़ किसी बड़े नेता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

डॉ लोहिया ने खरसावां गोलीकांड का तीव्र विरोध किया और इसे जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसा बताया. लोहिया यहां आये और पीड़ित परिवारों से मिले. डॉ लोहिया 18 जनवरी, 1948 को रांची आये और छोटानागपुर के इलाकों का दौरा किया. उनके साथ चाईबासा के समाजवादी नेता गोविंद लाल सुल्तानियां भी थे. डॉ लोहिया खरसावां में रक्तरंजित हाट मैदान भी गये, जो 01 जनवरी, 1948 को आदिवासियों के खून से लाल हो गया था. लोहिया ने कहा, ओड़िशा के अत्याचार से यहां की जनता काफी दुखी है. छोटानागपुर की एक इंच भूमि भी यहां के आदिवासी जाने नहीं देंगे.

खरसावां की एक जनसभा में उनके शब्द थे- खरसावां गोलीकांड में मारे गये बेकसूरों और उनके शोक-संतप्त परिजनों की पीड़ा असहनीय है. ऐसी घटना के बाद हमें अपनी आजादी संदिग्ध लगने लगी है. क्या फर्क पड़ता है कि पांच महीने पहले अंग्रेज भारत छोड़ कर गये हैं! हमारी पुलिस और फौज के रवैये में तो कोई अंतर नजर नहीं आता है. इसलिए, जितना जल्दी हो सके हमारी सरकारों और पुलिस को ब्रितानी मानसिकता से बाहर आना होगा, वरना, जनता के साथ उनके संघर्ष तेज होंगे.

केरल में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की सरकार थी. पत्तम थानु पिल्लई राज्य के मुख्यमंत्री थे. 11 अगस्त, 1954 को त्रावणकोर-कोचीन में किसानों का विरोध-प्रदर्शन चल रहा था. उद्वेलित किसानों पर पुलिस ने गोलियां चला दीं, जिसमें चार की मौत हो गयी. लोहिया प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव थे और नैनी जेल में बंद थे.

गोलीकांड से आहत होकर उन्होंने तार भेज कर अपनी ही सरकार से इस्तीफा मांग लिया. इस पर पार्टी अध्यक्ष जेबी कृपलानी ने कहा कि सरकारों में गोलियां चलती रहती हैं. डॉ लोहिया ने जवाब दिया- फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस में क्या अंतर है?

इस मुद्दे पर उन्होंने प्रसोपा से इस्तीफा दे दिया. यह वैचारिक शक्ति थी डॉ लोहिया में. यकीन नहीं होता कि 1910 में पैदा हुआ एक व्यक्ति जो महज 57 साल जीवित रहता है. वह भारत की आजादी की लड़ाई लड़ता है और गोवा की स्वतंत्रता के लिए भी आंदोलन करता है, वह नेपाल और म्यांमार में लोकतंत्र स्थापित करना चाहता है. वह आजादी से एक वर्ष पूर्व पूर्वी बंगाल के नोआखली में दंगे की आग बुझाता है. ऐसे राजनेता दुर्लभ ही पैदा होते हैं. नागरिक अधिकारों के लिए जितना संघर्ष डॉ लोहिया ने किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण भारत में नहीं मिलता.

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