Khufiya Review: विशाल भारद्वाज-तब्बू की जोड़ी की एक और खास प्रस्तुति है खुफिया.. क्लासिक बनते-बनते रह गयी

Khufiya Review: निर्देशक विशाल भारद्वाज की प्रेरणा एक बार फिर से उपन्यास बना है. यह फिल्म रॉ के यूनिट प्रमुख अमर भूषण की किताब एस्केप टू नोव्हेयर पर आधारित है .कहानी की शुरुआत वॉयस ओवर से होती है, जिसमें बताया जा रहा है कि करगिल युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच के हालात और बदतर हो चुके हैं.

फ़िल्म – खुफिया

निर्माता निर्देशक – विशाल भारद्वाज

कलाकार- तब्बू, वामिका गब्बी, अली फज़ल, आशीष विद्यार्थी,अज़मेरी हक़ बधो और अन्य

प्लेटफ़ॉर्म- नेटफ्लिक्स

रेटिंग – तीन

निर्देशक विशाल भारद्वाज और अभिनेत्री तब्बू ने हिंदी सिनेमा को हैदर, मकबूल जैसी बेमिसाल फिल्में दी हैं. यह जोड़ी जब भी साथ आती है, उम्मीदें बढ़ ही जाती है और इस जोड़ी की नयी फिल्म ख़ुफ़िया इन उम्मीदों पर बहुत हद तक खरी भी उतरती है, लेकिन सेकेंड हाफ में कहानी थोड़ी लड़खड़ा गई है. जिस वजह से मामला मकबूल और हैदर जैसा क्लासिक बनने से रह गया है, लेकिन यह विशाल भारद्वाज और तब्बू की जोड़ी की एक और उम्दा पेशकश बनकर जरूर सामने आती है.

रॉ एजेंट्स के दुनिया की है कहानी

निर्देशक विशाल भारद्वाज की प्रेरणा एक बार फिर से उपन्यास बना है. यह फिल्म रॉ के यूनिट प्रमुख अमर भूषण की किताब एस्केप टू नोव्हेयर पर आधारित है .कहानी की शुरुआत वॉयस ओवर से होती है, जिसमें बताया जा रहा है कि करगिल युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच के हालात और बदतर हो चुके हैं. दोनों मुल्कों की दिलचस्पी पडोसी मुल्क बांग्लादेश के सत्ता की हलचल में है. कहानी बांग्लादेश के ढाका में पहुंचती है और भारतीय एजेंट ऑक्टोपस (अज़मेरी) की हत्या हो जाती है. जिसके भारत में रॉ के ऑफिस में हलचल मच जाती है। कुछ समय बाद मालूम होता है कि गद्दार रॉ का ही एक एजेंट ( अली फ़ज़ल) है. जिसने ऑक्टोपस के खिलाफ़ मुखबरी की थी. उसे और उसके पीछे के असल चेहरे को रंगे हाथों पकड़ने की जिम्मेवारी कृष्णा मल्होत्रा (तब्बू) और उनकी टीम को मिलती है. क्या कृष्णा मेनन इस मिशन में कामयाब हो पायेंगी. यह सब कैसे होगा यही फिल्म की आगे की कहानी है. क्या वह अपनी सबसे करीबी एजेंट ऑक्टोपस की मौत का बदला ले पायेंगी. क्या खास रिश्ता है कृष्णा का एजेंट ऑक्टोपस के साथ. ये सब सवाल के जवाब भी ये फिल्म देती है.

फिल्म की खूबियां और खामियां

फिल्म की शुरूआत बहुत ही धारदार अंदाज़ में हत्या से होती है, और कहानी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ती है. गद्दार को पकड़ने के लिए जो जाल बिछाए गए हैं। वह कहानी में रोमांच को बढ़ाते हैं। इंटरवल तक फिल्म आपको पूरी तरह से बांधे रखती है. कई दृश्य आपको चौंकाते हैं।अली फजल की मां का किरदार जब डिलीवरी के बारे में पूछती है तो वह फिल्म के थ्रिलर को और बढ़ा जाता है. फिल्म रॉ एजेंट की दुनिया और उनकी तहकीकात को सामने लाती है. रॉ एजेंट्स पर अब तक कई फिल्में और सीरीज बन चुकी हैं, लेकिन यह फिल्म में एक अलग दुनिया को भी टच करती है. अली का किरदार खुद को देशद्रोही नहीं मानता है, वह फिल्म में खुद को देशभक्त करार देता है. उसकी अपनी दलील है। फिल्म यह भी दिखाती है कि जब बड़े देश और उससे जुड़े हित की बात हो तो अपने काबिल एजेंट को ही कई बार डबल क्रॉस करना पड़ जाता है. अमेरिका की मनमानी को भी फिल्म दिखाती है. खामियों की बात करे तो फर्स्ट हाफ तक फिल्म में जबरदस्त रोमांच है. सेकेंड हाफ में कहानी थोड़ी लड़खड़ा जाती है ,फिर रफ़्तार पकड़ती है लेकिन क्लाइमेक्स में वह रोमांच पर्दे पर नहीं आ पाया है, जो बिल्डअप फर्स्ट हाफ ने बनाया था. दूसरे भाग में कहानी पूर्व अनुमनित भी हो गयी है.जो फिल्म को बोरिंग तो नहीं बनाती है लेकिन क्लासिक बनने से जरूर रोक गई है. दूसरे पहलुओं की बात करें तो फिल्म के संवाद अच्छे बन पड़े हैं. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी भी कहानी के साथ न्याय करती है।विशाल भारद्वाज की फिल्म हो और संगीत की बात ना हो ऐसा कैसे हो सकता है. विशाल भारद्वाज की फिल्म का संगीत भी एक अहम किरदार की तरह होता है, इस फिल्म में भी इसकी सशक्त उपस्थिति है. पुराने गाने को इस्तमाल करने के साथ-साथ जिस तरह से फिल्म में कबीर के दोहो को पिरोया गया है वह काबिलेतारीफ है. वह एक फिल्म में अलग ही रंग भरता है.

तब्बू के साथ बाकी कलाकारों का अभिनय है कमाल

इस फिल्म की यूएसपी इसकी कास्टिंग है खासकर महिला पात्र कहानी की अहम धुरी हैं. जिसकी सबसे अहम कडी तब्बू है. उन्हें अपने किरदार की पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ की चुनौतियों को बारीकी से हर दृश्य में जिया है, वह कमजोर पड़ती है, गिरती है फिर उठकर खड़ी होती हैं. किसी की जान बचाने के लिए वह कभी पूरे मिशन को ताक पर रख देती है,तो कभी किसी की जान बिना सोचे दो पल में ले लेती हैं. कृष्णा मेहरा की निजी जिंदगी के द्वंद को भी तब्बू ने अपने अभिनय में बख़ूबी सामने लाया है. तब्बू के बाद जिस अभिनेत्री ने फिल्म में ध्यान आकर्षित किया है.वह वामिका गब्बी है. उन्होंने अपने किरदार को पहले चुलबुले और प्यारे अंदाज़ से सेकंड हाफ में सीरियस मोड पर परफॉर्म किया है.वह यह बता जाता है कि वह विशाल भारद्वाज के एक के बाद एक प्रोजेक्टस में क्यों कास्ट होती जा रही हैं.अज़मेरी हक़ छोटी सी भूमिका में भी याद रह गयी हैं. अली फज़ल की माँ की भूमि का में देखी अभिनीत नवीन्द्र बहल का किरदार भी दिलचस्प है.महिला कलाकारों का साथ पुरुष अभिनेताओं ने बखूबी दिया है. अली फज़ल और आशीष विद्यार्थी के अभिनय का रेंज फिल्म को और ज्यादा एन्गेजिंग और एंटरटेनिंग बन गया है. बाकी के कलाकारों ने भी अपनी – अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.

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लेखक के बारे में

Author: कोरी

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