Diwali 2022: झारखंड की चाकुलिया गौशाला के दीयों से रोशन होंगे दिल्ली, कोलकाता समेत कई शहर, ये है खासियत

Diwali 2022: झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले की चाकुलिया गौशाला में बन रहे दीये से देश की राजधानी दिल्ली समेत कोलकाता एवं झारखंड की राजधानी रांची रोशन होगी. गोबर, मिट्टी, प्रीमिक्स पाउडर, रिफाइंड तेल तथा मिट्टी के रंगों से चाकुलिया नया बाजार स्थित गौशाला में दीये तैयार किए जा रहे हैं.

स्टील के सांचे में इन दीयों को तैयार कर एवं मिट्टी के रंगों से रंगे जाने के बाद धूप में सुखाकर पैकेट में बंद कर दिया जाता है. प्रत्येक पैकेट में 10 दीये होते हैं. इसकी कीमत 40 रुपये है. कोलकाता के बाजारों में इस दीये की काफी अधिक मांग है. इसके अलावा नई दिल्ली, हैदराबाद, रांची, बिलासपुर तथा ओडिशा के बाजारों में भी इन दीयों की मांग है.

गौशाला कमेटी के सचिव संजय लोधा ने बताया कि एक लाख दीये बनाने का ऑर्डर उन्हें पहले ही मिल चुका है, लेकिन क्षेत्र में मजदूरों की कमी के कारण दीया बनाना मुश्किल हो रहा है. उन्होंने कहा कि अब तक 40 से 50 हजार दीयों का निर्माण कर कोलकाता एवं नई दिल्ली भेजा जा चुका है. कई युवा चाकुलिया गौशाला से खरीदकर दीयों को ऑनलाइन बेच रहे हैं.

चाकुलिया गौशाला में निर्मित दीयों की खासियत यह है कि इसे सांचे में भरकर सुंदर आकृति दी जा रही है. बाजार में जिस दीये की कीमत लगभग 10 रुपये है. उस दीये को चाकुलिया गौशाला में निर्माण कर महज 4 रुपये में बेचा जा रहा है. एक बार तेल डालने के बाद दीया 1 घंटा तक चलेगा. अन्य दीये की तरह इस दीये से तेल की एक बूंद नहीं गिरती है. इससे दीवारों को खराब होने से बचाया जा सकता है.

आमतौर पर कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीये को आग की भट्टी में जला कर पकाया जाता है. इसके बाद दीये तैयार होते हैं, परंतु चाकुलिया गौशाला में बनने वाले दीये को गोबर, मिट्टी एवं प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता है. इसे धूप में सुखाकर तैयार किया जाता है. इस कारण इसका इस्तेमाल के बाद खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है. इस्तेमाल के बाद इसे तोड़कर पेड़ पौधों की जड़ों में डालने से यह खाद का काम करता है.

चाकुलिया गौशाला के सचिव संजय लोधा तथा कोषाध्यक्ष आलोक लोधा ने बताया कि यहां के दीये की मांग सर्वाधिक पश्चिम बंगाल के कोलकाता में है. इसके अलावा देश के कई बड़े शहरों में चाकुलिया गौशाला से दीये भेजे जा रहे हैं. इन दीयों की कीमत उतनी ही रखी गई है जिससे कि आम लोग इसे आसानी से खरीद सकें. इसे बेचने के बाद होने वाले मुनाफे से गाय का भोजन तथा रखरखाव का इंतजाम होता है. आपको बता दें कि चाकुलिया गौशाला में फिनाइल, हवन- टिकिया, देसी गाय का घी, धूप, केंचुआ खाद का भी निर्माण किया जाता है और उसकी बिक्री की जाती है.

रिपोर्ट : राकेश सिंह, चाकुलिया, पूर्वी सिंहभूम

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लेखक के बारे में

By Guru Swarup Mishra

मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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