Azadi Ka Amrit Mahotsava : लोगों के जेहन में अब भी जिंदा है वह ‘डेंजरस एंड डिस्पेरेट कैदी’ सीताराम सिंह

देश और समाज के हित को परिवार हित से ऊपर मानते हुए सीताराम सिंह स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन लगा देने का निर्णय लिया. 12 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी. उसके बाद आजादी की लड़ाई में उन्होंने बड़ी भूमिका निभायी.

बचपन से ही भावुक और क्रांतिकारी मिजाज वाले सीताराम सिंह आजादी आंदोलन के अप्रतिम योद्धा थे. उनका जन्म 19 मई 1919 को हुआ था. जब दो-ढाई साल के थे, तो मां इस दुनिया से चल बसीं. जिले के महुआ प्रखंड के कुशहर गांव निवासी सीताराम सिंह अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे. देश और समाज के हित को परिवार हित से ऊपर मानते हुए उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन लगा देने का निर्णय लिया. 12 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी. उसके बाद आजादी की लड़ाई में उन्होंने बड़ी भूमिका निभायी. अपने संघर्षपूर्ण जीवन में दोनों बेटों की मौत का दुख भी सहना पड़ा, लेकिन अपने लक्ष्य और मार्ग से डिगे नहीं.

1942 के आंदोलन में निभायी सक्रिय भूमिका

1937 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता लेने के बाद 1942 के आंदोलन में सीताराम सिंह पूरे जोश-खरोश के साथ कूद पड़े. जंग-ए-आजादी में कूदने की प्रेरणा उन्हें देशभक्तों की कुर्बानी से मिली थी. 11 अगस्त 1942 को उन्हें हाजीपुर जेल में डाल दिया गया. लेकिनस वे वहां सिर्फ तीन दिन ही रहे. 14 अगस्त को दिन के करीब दो बजे वे जेल की सलाखों से निकल भागने में सफल रहे. जेल से फरार होकर वे जनता को गोलबंद करने में जुट गये. 1942 के नवंबर में ठीक दीपावली के दिन वे रामनंदन मिश्र, योगेंद्र शुक्ला, सूरज नारायण सिंह, गुलाली सोनार और शालिग्राम सिंह, इन पांच साथियों को लेकर जेल की दीवार फांदने के बाद इनका नाम पूरे देश में फैल गया. इसी तरह हनुमान नगर (नेपाल) की जेल तोड़ कर डॉ लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे अग्रणी नेताओं को जेल से छुड़ा ले जाने में भी सीताराम सिंह की अहम भूमिका रही.

खतरनाक कैदी मानते थे अंग्रेज

हनुमान नगर से भागने के क्रम में सीतामढ़ी के माधोपुर गांव में सीताराम सिंह और श्यामनंदन सिंह पकड़ लिये गये. भीड़ के द्वारा उन पर भाले से प्रहार किया गया, जो इनकी छाती में लगा. लाठी-डंडों से बुरी तरह पिटाई भी की गयी. गिरफ्तार करके मुजफ्फरपुर जेल में रखा गया. 22 वर्ष तीन महीने की सजा हुई. बाद में सीताराम सिंह, श्यामनंदन सिंह, नारायण सिंह और अमीर सिंह को क्रिमिनल जेल, बक्सर भेज दिया गया. इनके टिकट पर लिख दिया गया- डेंजरस एंड डिस्पेरेट.

45 दिनों तक बक्सर जेल में किया अनशन

राजनीतिक बंदी का दर्जा पाने के लिए इन लोगों ने बक्सर जेल में अनशन शुरू कर दिया था. सात लोग अनशन पर थे, जो 45 दिनों तक डटे रहे. बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह के विशेष आग्रह पर इन लोगों ने अपना अनशन खत्म किया. दुर्भाग्य से उसी रात श्यामनंदन सिंह की मृत्यु हो गयी. इसके बाद इन लोगों को हजारीबाग जेल भेज दिया गया. आजादी के बाद भी सीताराम सिंह किसानों, मजदूरों और आम जनता की लड़ाई लड़ते हुए अनेक बार कारावास गये. डॉ लोहिया के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ कर वे समाजवादी व्यवस्था कायम करने के लिए संघर्षरत रहे. 1970 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और 1976 तक अपनी उपस्थिति से सदन को गौरवान्वित किया. 30 नवंबर 2018 को सौ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.

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