नाराज महालक्ष्मी ने तोड़ा प्रभु जगन्नाथ का रथ, ओडिशा की तर्ज पर सरायकेला में निभायी गयी रथ भंगिनी परंपरा

Jharkhand News, सरायकेला न्यूज (शचिंद्र कुमार दाश) : इस वर्ष रथ यात्रा में प्रभु जगन्नाथ का रथ नहीं चला, परंतु शुक्रवार की रात हेरा पंचमी पर ओडिशा के जगन्नाथपुर की तर्ज पर सरायकेला में रथ भंगिनी परंपरा निभायी गयी. सरायकेला, खरसावां व हरिभंजा में सदियों से चली आ रही रथ भंगिनी परंपरा निभायी गयी.

Jharkhand News, सरायकेला न्यूज (शचिंद्र कुमार दाश) : इस वर्ष रथ यात्रा में प्रभु जगन्नाथ का रथ नहीं चला, परंतु शुक्रवार की रात हेरा पंचमी पर ओडिशा के जगन्नाथपुर की तर्ज पर सरायकेला में रथ भंगिनी परंपरा निभायी गयी. सरायकेला, खरसावां व हरिभंजा में सदियों से चली आ रही रथ भंगिनी परंपरा निभायी गयी.

मंदिर के चंद सेवायतों ने सामाजिक दूरी का अनुपालन करते हुए हेरा पंचमी पर आयोजित होने वाले सभी धार्मिक रस्मों को निभाया. मौके पर मां लक्ष्मी द्वारा प्रभु जगन्नाथ के रथ के एक हिस्से की लकड़ी को तोड़ कर परंपरा को निभाया गया. कोविड-19 को देखते हुए इस वर्ष शुक्रवार की रात रथ भंगिनी के इस धार्मिक अनुष्ठान में कम श्रद्धालु भी शामिल हुए.

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धार्मिक मान्यता है कि भाई-बहन के साथ गुंडिचा मंदिर गये प्रभु जगन्नाथ के पांच दिन बाद भी श्रीमंदिर वापस नहीं लौटने पर मां लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं तथा वह स्वयं सखियों संग गुंडिचा मंदिर जा पहले प्रभु जगन्नाथ झगड़ती हैं. मां लक्ष्मी के क्रोध का खामियाजा प्रभु जगन्नाथ के रथ नंदीघोष को उठाना पड़ता है. मां लक्ष्मी क्रोध में आ कर प्रभु जगन्नाथ के रथ नंदीघोष को तोड़ देती हैं.

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इसके बाद प्रभु जगन्नाथ को कोसते हुए मां लक्ष्मी वापस लौटती हैं. शुक्रवार को देर रात इस धार्मिक परंपरा को सरायकेला, खरसावां व हरिभंजा में निभाया गया. मां लक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा को लक्ष्मी मंदिर से पालकी में लेकर गुंडिचा मंदिर तक लाकर रस्मों को निभाया गया. इसके बाद बाहर खड़े प्रभु जगन्नाथ के रथ नंदीघोष पर मां लक्ष्मी की प्रतिमा को रखकर रथ का एक हिस्सा तोड़ा गया. मान्यता है कि मां लक्ष्मी प्रभु जगन्नाथ से नाराज होकर रथ के एक हिस्से को तोड़ देती हैं. फिर मां लक्ष्मी वापस अपने मंदिर में लौटती हैं.

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रथ भंगिनी के इस धार्मिक रस्म को घोष यात्रा का काफी महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है. लक्ष्मी द्वारा रथ तोड़े जाने की परंपरा को हर साल निभाया जाता है. इसके साथ ही वापसी रथ यात्रा (बाहुड़ा यात्रा) की तैयारी शुरू हो जाती है. कोविड-19 को लेकर इस वर्ष रथ भंगिनी के रस्म में काफी कम श्रद्धालु जुटे थे. खरसावां में रथ भंगिनी की इस परंपरा में मुख्य रुप से राजा गोपाल नारायण सिंहदेव, पुरोहित अंबुराख्या आचार्य, विमला षाडंगी, पुजारी राजाराम सतपथी आदि मौजूद रहे. इसी तरह हरिभंजा में आयोजित रथ यात्रा में जमीनदार विद्या विनोद सिंहदेव, पुजारी पंडित प्रदीप दाश, भरत त्रिपाठी आजि मौजूद थे.

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Posted By : Guru Swarup Mishra

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