जक्टर ऐप की हुई एंट्री, नो-URL टेक्नोलॉजी से डेटा और प्राइवेसी रहेगी पूरी तरह सेफ

रांची प्रेस क्लब में भारतीय सोशल मीडिया ऐप जक्टर की आधिकारिक एंट्री की जानकारी दी गई. जक्टर एक प्राइवेसी-फोकस्ड ऐप है, जो नो-यूआरएल तकनीक पर काम करता है. इसमें यूजर्स का डेटा, फोटो, वीडियो और मैसेज पूरी तरह सेफ और एन्क्रिप्टेड रहते हैं. जक्टर का दावा है कि प्लेटफॉर्म खुद भी यूजर के निजी डेटा तक नहीं पहुंच सकता, जिससे गलत इस्तेमाल की संभावना खत्म हो जाती है.

Zktor App: रांची प्रेस क्लब में भारतीय सोशल मीडिया ऐप जक्टर के बारे में जानकारी दी गई. जक्टर ऐप के सीईओ सुनील कुमार सिंह ने बताया कि सभी सोशल मीडिया ऐप्स हमारा बिहेवियर ट्रैक करते हैं. हमारे द्वारा अपलोड किये गए फोटो वीडियो तो कोई भी आसानी से डाउनलोड कर सकता है. अब एआई के युग में उन्हें मॉडिफाई कर आसानी से गलत उपयोग भी किया जा सकता है. ऐसे समस्याओं के समाधान के लिए जक्टर की शुरुआत की गई है. 

क्या है जक्टर ऐप?

जक्टर एक ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जो यूजर्स की प्राइवेसी, डेटा सेफ्टी और डिजिटल डिग्निटी को गंभीरता के साथ सिस्टम-डिजाइन के स्तर पर प्राथमिकता देता है. जक्टर नो-यूआरएल तकनीक पर काम करता है. जिससे वीडियो बाहर से डाउनलोड या गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सके. यह जानकारी प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में दी गई. मौके पर सीएफओ अंशु प्रिया, स्पोकपर्सन डॉ. सोमनाथ आर्या शामिल रहे.

कैसे काम करता है जक्टर?

खुद प्लेटफॉर्म के लिए भी यूजर के डेटा तक पहुंच नहीं होगी. जक्टर ऐसी ऐप है जिसमें सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म, लॉन्ग वीडियो प्लेटफॉर्म और पुरी तरह से एन्क्रिप्टेड मैसेंजर शामिल हैं. इसके ऐप और सर्वर की संरचना ही ऐसी बनाई गई है कि यूजर का निजी डेटा, मैसेज, फोटो या वीडियो पूर्ण रूप से एन्क्रिप्टेड फॉर्म में सेव होता है. खुद प्लेटफॉर्म के लिए भी यूजर के डेटा तक पहुंच तकनीकी रूप से संभव नहीं रहती. इसे ही जीरो नॉलेज आर्किटेक्चर कहा जाता है. 

जक्टर का झारखंड कनेक्शन

डॉ. सोमनाथ आर्या ने बताया कि जक्टर को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सॉफ्टा के फाउंडर और जक्टर के शिल्पकार सुनील कुमार सिंह का झारखंड से गहरा नाता है. वे अविभाजित झारखंड में यानी कि उस समय के बिहार के औरंगाबाद के एक छोटे से गांव में जन्मे और 2 दशक से भी ज्यादा फिनलैंड में बिताया है. इसके मोनेटाइजेशन मॉडल में क्रिएटर्स को कमाई का फ्लैट 70 प्रतिशत हिस्सा दिया जाता है. वहीं इसके हाइपरलोकल ऑपरेशंस के जरिए टियर 2 से टियर 4 जैसे छोटे शहरों में हजारों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे.

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Published by: Ankit Anand

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