उनके दोबारा उम्मीदवार बनने से इलाके के अधिकांश तृणमूल कार्यकर्ता नाराज दिख रहे हैं. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव से कुछ ही दिन पहले ममता बनर्जी की लहर को देखकर वह कांग्रेस का दामन छोड़कर तृणमूल में शामिल हो गए थे. उनकी लोकप्रियता देखकर दीदी ने उन्हें टिकट दिया़ चुनाव जीतकर वह ममता के प्रिय भी बन गये़ उससे पहले अमल आचार्य कांग्रेस के एक दिग्गज नेता थे व ग्राम पंचायत प्रधान थे.इटाहार सीट है तो उत्तर दिनाजपुर जिले के अधीन लेकिन यह विधानसभा सीट बालुरघाट लोकसभा के अंदर है़.
इटाहार में अमल आचार्य की बढ़ीं मुश्किलें
सिलीगुड़ी. वर्तमान में भले ही ईटाहार में तृणमूल कांग्रेस के विधायक हैं लेकिन जनता ने लगता है कि तृणमूल से अपना मुंह मोड़ लिया है. आरोप है कि विधायक बनने के बाद अमल आचार्य ने सिर्फ अपने लोगों को ही देखा़ उनके परिजनों को सरकारी नौकरी मिली़ इसके साथ ही उनकी संपत्ति ने भी छलांग […]

सिलीगुड़ी. वर्तमान में भले ही ईटाहार में तृणमूल कांग्रेस के विधायक हैं लेकिन जनता ने लगता है कि तृणमूल से अपना मुंह मोड़ लिया है. आरोप है कि विधायक बनने के बाद अमल आचार्य ने सिर्फ अपने लोगों को ही देखा़ उनके परिजनों को सरकारी नौकरी मिली़ इसके साथ ही उनकी संपत्ति ने भी छलांग लगायी है़ स्थानीय मतदाताओं का आगे आरोप है कि तृणमूल विधायक ने ना तो इलाके का विकास किया और ना ही आमलोगों की कोइ सुध ली़ इस बार भी पार्टी ने उन्हीं को टिकट दिया है़ वर्ष 2011 के राज्य विधानसभा चुनाव में अमल आचार्य ने ही तृणमूल को यह सीट दिलाई थी़ इसलिए पार्टी इस बार भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकी.
इस विधानसभा सीट का इतिहास देखा जाए तो यहां कांग्रेस का दबदबा रहा है. वर्ष 1951 के विधानसभा चुनाव में वनमाली दास कांग्रेस की विधायक बनी. 1957 के चुनाव में सीपीआई के बंसता लाल चटर्जी विधायक बने. फिर 1962 के विधानसभा चुनाव में डा. जैनुल अबेदिन ने सीपीआई से यह सीट छीन ली़ लगातार सात बार वह यहां से चुनाव जीतते रहे़ वह 1987 तक यहां के विधायक बने रहे. जैनल अबेदिन के एकाधिकार को 1987 के चुनाव में सीपीआई के स्वदेश चाकी ने तोड़ा और वही विधायक बने़ 1991 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के डा. जैनल अबेदिन ने सीपीआई से यह सीट छीन कर फिर से अपने कब्जे में कर लिया. वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई के श्रीकुमार मुखर्जी ने इस सीट पर विजय हासिल की़ लगातार तीन बार इसी सीट से जीतकर वर्ष 2011 तक यहां के विधायक बने रहे. वाम मोरचा शासनकाल में श्रीकुमार मुखर्जी राज्य के मंत्री भी रह चुके हैं.
ईटाहार में तृणमूल के इतिहास पर गौर करें तो यह पार्टी कांग्रेस के पुराने खिलाड़ियों पर ही दाव लगाते रही है़ वर्ष 2006 के निधानसभा चुनाव में तृणमूल ने कांग्रेस के दिग्गज व इस सीट से आठ बार विधायक रह चुके डा. जैनल अबेदिन पर भरोसा जताया था लेकिन नौवीं बार वह जीत नहीं सके. इसके बाद वर्ष 2011 के चुनाव से कुछ ही दिन पहले तृणमूल में शामिल हुए कांग्रेस के ही दिग्गज अमल आचार्य को अपना उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारा. दीदी लहर में विधायक की कुर्सी उनके हाथ लग गयी. चुनाव में उम्मीदवारी नहीं मिलने से तृणमूल के बागी रकबुल बक्श निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे और तीसरे स्थान पर रहे.
इलाके के लोगों से बात करने पर अधिकांश लोगों ने आरोप लगाया कि विधायक बनने के बाद अमल आचार्य ने विकास का कार्य कुछ नहीं किया,सिर्फ अपनी संपत्ति बढ़ाने लगे रहे. इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने बेटी को प्राथमिक स्कूल में नौकरी दिला दी. इनलोगों ने कहा कि इलाके में काफी समस्याएं हैं. इसमें पेयजल व बिजली की समस्या सबसे बड़ी है. यहां के पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा काफी अधिक है, जिसका सीधा असर आमलोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है़ इस समस्या को दूर करने के लिए विधायक ने कोइ कदम नहीं उठाया. बिजली भी नाम मात्र के लिए है़ बिजली के खंभे हैं, तार भी है लेकिन बिजली नहीं आती है. इसके अलावा शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा की स्थिति भी काफी खराब है. यातायात व सड़क व्यवस्था भी बेहाल है.
इस विधानसभा चुनाव पर दीदी ने फिर से अमल आचार्य पर दांव खेला है. अमल आचार्य को टक्कर देने के लिये माकपा व कांग्रेस के गठबंधन ने सीपीआई के डा. श्रीकुमार मुखर्जी को उतारा है. कइ लोगों का कहना है कि अमल आचार्य के बदले श्रीकुमार मुखर्जी की छवि काफी साफ-सुथरी है. श्रीकुमार मुखर्जी मालदा कालेज के गणित के प्राध्यापक रह चुके है. इनकी योग्यता के सामने अमल आचार्य काफी बौने है. इसके अलावे वे राज्य के मंत्री भी रह चुके हैं. अब देखना है कि इस चुनाव में जीत किसकी होती है़