मालदा : कश्मीर के बारामुला में आतंकी हमले में बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के पांच श्रमिकों की निर्मम हत्या के बाद वहां से बंगाल के श्रमिकों का पलायन शुरु हो चुका है. अब यहां के श्रमिक मोटी आय के लालच में अपनी जान को जोखिम में डालने के पक्ष में नहीं लग रहे. उल्लेखनीय है कि बंगाल से कश्मीर गये श्रमिक वहां के सेब और नारंगी के बागानों में काम कर अच्छी खासी आय कर लेते थे. 60 वर्षीय लुत्फर शेख नामक श्रमिक ने बताया कि वह सीजन में 700 से लेकर 800 रुपये तक प्रतिदिन कमायी कर लेते थे.
इनमें से कई तो ऊनी वस्त्र बनाने वाले कारखानों में काम करते थे. लेकिन अब वहां कोई रहना नहीं चाहता है. कहते हैं कि जिंदगी रही तो रोजगार के अवसर और भी मिलेंगे. लेकिन जान को जोखिम में डालकर रोजगार करना कोई बुद्धिमानी नहीं है. प्रशासन के खाते में पंजीकृत लुत्फर शेख नामक उक्त बुजुर्ग श्रमिक मंगलवार की सुबह कालियाचक स्थित अपने घर पहुंच गये थे जिससे उन्हें काफी राहत मिली है. अल्लाताला ने कम से कम उनकी जान तो बख्श दी है.
इसके लिये वह अल्लाह का शुक्र मना रहे हैं. अपुष्ट खबर के मुताबिक मालदा जिले के कालियाचक एक, दो और तीन नंबर ब्लॉक से कम से कम कई सौ श्रमिक हर साल रोजगार के लिये कश्मीर रवाना होते थे. ये श्रमिक फल और फूलों के बगीचे में काम करते थे. कालियाचक एक नंबर ब्लॉक अंतर्गत दो नंबर ग्राम पंचायत के करारी चांदपुर गांव के निवासी लुत्फर ने बताया कि पिछले 20 साल से वह कश्मीर में श्रमिक का काम करते आ रहे थे. वे वहां के सेब के बागान में काम करते थे. इस तरह की निर्मम हत्याकांड के बारे में सुनकर उनका कलेजा दहल गया.
इसके बाद ही यहां से गये सैकड़ों श्रमिक अब बंगाल में लौटने लगे हैं. उन्होंने कहा कि बंगाल में पहाड़ को छोड़कर संतरे के बागान दूसरी जगह नहीं हैं. इसलिये कश्मीर जैसे दूर दराज के राज्य में उन्हें जाना पड़ रहा था. उन्होंने बताया कि मुर्शिदाबाद के पांचों श्रमिक उनके क्वार्टर के बगल में ही रहते थे. अचानक एक रोज सुना कि उनका अपहरण कर लिया गया है. उसके बाद पुलिस उनके खून से सने शवों को सामने लायी. सुना कि आतंकियों ने उन्हें मारा है.
इस तरह की घटना होगी यह सपने में भी नहीं सोचा था. इसलिये अब बाहर का कोई श्रमिक वहां रहना नहीं चाहता. स्थानीय ग्राम पंचायत सदस्य मोहम्मद सालाउद्दीन शेख ने बताया कि इस इलाके से करीब एक सौ श्रमिक कश्मीर गये थे. लुत्फर शेख लौट आये हैं. इसके पहले इनके दो बेटे भी लौट आये थे. कश्मीर में इन श्रमिकों की काफी मांग है. इसके बावजूद जीवन को संकट में डालकर अब श्रमिक वहां रहना नहीं चाह रहे हैं. इसलिये ये लोग अपने बंगाल में लौटने लगे हैं.
