बंगाल के चुनाव में क्यों विफल हो जाती है मुसलमानों की गोलबंदी?

बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाने के पार्टी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर के प्रयास के बाद एक बार फिर मुसलमानों की सामाजिक-राजनीतिक गोलबंदी का दौर देखने को मिल रहा है.

By AKHILESH KUMAR SINGH | January 7, 2026 1:21 AM

हुमायूं कबीर के सक्रिय होने से तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन की अटकलें

एजेंसियां, कोलकाताबंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाने के पार्टी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर के प्रयास के बाद एक बार फिर मुसलमानों की सामाजिक-राजनीतिक गोलबंदी का दौर देखने को मिल रहा है. हालिया कुछ वर्षों में इससे पहले भी मुसलमानों की गोलबंदी हो चुकी है, लेकिन कभी भी चुनाव परिणामों में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा. इस तरह के उतार-चढ़ाव होते रहते हैं, लेकिन बंगाल में अल्पसंख्यकों का वोट देने का तरीका दशकों से अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है, जो न तो धार्मिक करिश्मे से और न ही प्रतीकात्मक बयानों से ज्यादा प्रभावित हुआ है. बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में अब कुछ ही महीने बाकी रह गये हैं. ऐसे में कबीर के विद्रोह जैसी घटनाओं, तीखी बयानबाजी और भावनात्मक प्रतीकवाद के कारण टीएमसी के अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन की अटकलें पैदा हो गयी हैं. यह वोट बैंक लंबे समय से पार्टी का मजबूत चुनावी आधार माना जाता है. इस तरह की घटनाएं पहले भी राजनीति और मीडिया में चर्चा का विषय रही हैं, लेकिन इनका चुनावी गणित पर कम असर देखने को मिला. साल 2016 में मौलवी तोहा सिद्दीकी और 2021 में अब्बास सिद्दीकी जैसी राजनीतिक हस्तियां भी चुनावी प्रचार के दौरान जनसैलाब जुटाने में सफल रही थीं, जबकि फिलहाल कबीर की बयानबाजी को देखते हुए भी मुस्लिम राजनीति में एक नया राजनीतिक नेतृत्व खड़ा होने का दावा किया जा रहा है. हर घटना से तृणमूल के अल्पसंख्यक वोट बैंक में चोट पहुंचने और एक वैकल्पिक मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के उभरने की उम्मीदें बढ़ गयी थीं. व्यावहारिक रूप से देखें तो इन दावों का असर तब तक बना रहता है, जब तक चुनाव अभियान समाप्त नहीं हो जाते. उसके बाद गणित (चुनावी आंकड़े) ही हावी हो जाता है. अब्बास सिद्दकी की राजनीतिक शुरुआत से लेकर कबीर के राजनीतिक प्रयास तक, बंगाल में मुस्लिम-केन्द्रित पहलों में एक समानता रही है. ये पहल चुनावों से पहले चरम पर पहुंच जाती हैं, बहस तेज होती हैं, लेकिन अंत में वोटिंग पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता. धार्मिक प्रभाव से प्रेरित चुनावी मुहिम वोटों के मामले में बदलाव लाने में असफल रही हैं, क्योंकि बूथ स्तर पर संगठन, गठबंधन की प्रबंधन क्षमता और वोट ट्रांसफर करने का खेल निर्णायक साबित हुआ है. विश्लेषकों और नेताओं का मानना है कि यह स्थिति नेतृत्व की विफलता नहीं, बल्कि संगठन की सीमाओं की वजह से पैदा होती है. राजनीतिक विश्लेषक मोईदुल इस्लाम ने कहा, ‘धार्मिक नेता भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन वे वोटों को सीटों में बदलने में सक्षम नहीं होते. मतदाताओं के मन में सीधा सा सवाल होता है- कौन जीत सकता है और कौन भाजपा को रोक सकता है.’ साल 2021 के चुनाव से पहले अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आइएसएफ) का गठन कर वामपंथी दलों और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. माना जा रहा था कि यह दल तृणमूल का गणित बिगाड़ सकता है. लेकिन यह केवल एक सीट जीत सका. इससे बंगाल की राजनीति में एक बार फिर यह साबित हो गया कि केवल प्रचार से चुनावी सफलता नहीं मिलती. आइएसएफ के एकमात्र विधायक नौशाद सिद्दीकी ने कहा, “लोग रैलियों में भावनाओं के साथ आते हैं, लेकिन डर और गुणा-भाग के आधार पर वोट डालते हैं. अगर लोग महसूस करते हैं कि उनके वोट से भाजपा को फायदा होगा, तो वे पीछे हट जाते हैं. सिद्दीकी के परिवार से जुड़ी फुरफुरा शरीफ दरगाह हुगली में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक स्थल बनी हुई है, लेकिन वहां के मतदाताओं का रुझान बदलता रहता है. तृणमूल के खिलाफ कबीर के विद्रोह के बाद एक बार फिर बहस शुरू हो गयी है. पार्टी के हिंदू समर्थक रुख की आलोचना, बाबरी मस्जिद के जैसी मस्जिद बनाने का एलान और जनता उन्नयन पार्टी की स्थापना ने बंगाल के चुनावी माहौल में हलचल पैदा कर दी है. कबीर ने कहा, ‘मैं वोटों का बंटवारा नहीं कर रहा, मैं उन आवाजों को उठा रहा हूं, जिन्हें दबाया गया है.’ मुर्शिदाबाद में उनकी रैलियों में काफी भीड़ जुटी है, जो प्रतिनिधित्व से जुड़ी शिकायतों को जाहिर करती है. उन्होंने 135 सीटों पर चुनाव लड़ने और वामपंथियों, आइएसएफ और एआइएमआइएम के साथ संबंध बनाये रखने का संकेत दिया है. माकपा के एक नेता ने कहा कि बिना जोश, कार्यकर्ताओं, पोलिंग एजेंटों और बूथ स्तर तंत्र के आपका चुनाव अभियान एक दिन नहीं चल सकता. भाजपा की सोच है कि पहचान-आधारित लामबंदी से ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलेगा और हिंदू वोट एकजुट होगा, जिससे बहुपक्षीय मुकाबले में पार्टी को फायदा हो सकता है. सामाजिक शोधकर्ता साबिर अहमद ने कहा कि बंगाल में कांग्रेस के दिग्गज नेता एबीए गनी खान चौधरी के बाद कोई ऐसा मुस्लिम नेता नहीं उभरा है, जिसे पूरे बंगाल में स्वीकार्यता मिली हो. अहमद ने कहा, “यहां के मुसलमानों ने देखा है कि अन्य राज्यों में वोटों के बंटवारे के कारण क्या हुआ. इसी डर की वजह से मुसलमान आगे नहीं सोच पाते हैं.” राज्य के मंत्री फिरहाद हकीम ने कहा कि अल्पसंख्यक जानते हैं कि केवल तृणमूल ही भाजपा को रोक सकती है. इस्लाम ने कहा, “बंगाल में चुनावी गणित महत्वपूर्ण होता है. जब तक मुसलमानों के नेतृत्व वाला कोई मजबूत संगठन नहीं बनता, तब तक ये सारी बहसें और लामबंदी सिर्फ चर्चा तक ही सीमित रहेंगी, इससे चुनावी नतीजे नहीं बदलेंगे. ” एक तरफ नेता उभरते हैं और बहसें होती हैं, तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक वोट अपनी जगह पर स्थिर रहता है. यहां चुनावी गणित से ही फैसला होता है, बयानबाजियों या प्रचार से नहीं.

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