अनियोजित शहरीकरण से दार्जिलिंग में भूस्खलन

पर्यावरणविदों ने दार्जिलिंग में भूस्खलन को मानव निर्मित पारिस्थितिक आपदा बताया है, जो दशकों से वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और प्रशासनिक उदासीनता का अपरिहार्य परिणाम है.

पर्यावरणविदों ने उत्तर बंगाल में आयी आपदा को मानव निर्मित बताया, कहा- जलवायु के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत

संवाददाता, कोलकातापर्यावरणविदों ने दार्जिलिंग में भूस्खलन को मानव निर्मित पारिस्थितिक आपदा बताया है, जो दशकों से वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और प्रशासनिक उदासीनता का अपरिहार्य परिणाम है, जिसने संवेदनशील हिमालयी ढलुआ भूभाग को विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है. उन्होंने कहा कि आगे का रास्ता विकेंद्रीकृत आपदा नियोजन, निर्माण मानदंडों का सख्त प्रवर्तन और जलवायु के प्रति संवेदनशील विकास में निहित है, ताकि पहाड़ों की रानी को बार-बार आपदा क्षेत्र में बदलने से रोका जा सके. लंबे समय से पर्यटकों के लिए पसंदीदा रही सुरम्य दार्जिलिंग पहाड़ियां अब प्रकृति का कहर झेल रही हैं. नॉर्थ बंगाल साइंस सेंटर के सदस्य एवं पर्यावरणविद् सुजीत राहा ने कहा, ‘‘पहाड़ दशकों की उपेक्षा की कीमत चुका रहे हैं-वनों की कटाई, अनियोजित सड़कें और अंधाधुंध निर्माण ने भूभाग को अस्थिर बना दिया है. बारिश तो बस एक कारण है; असली वजह यह है कि हमने पहाड़ों के साथ कैसा व्यवहार किया है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे संकटों से निपटने के लिए कोई उचित आपदा प्रबंधन योजना नहीं है. प्रशासन और अधिकारियों को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए तथा इसे वार्षिक त्रासदी नहीं मानना चाहिए.’

कोलकाता में सरोजिनी नायडू महिला महाविद्यालय में प्रोफेसर एवं आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ शैलेंद्र मणि प्रधान ने कहा कि भूस्खलन देश में पारिस्थितिकीय रूप से सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्रों में से एक में अनियमित विकास का प्रत्यक्ष परिणाम है. उन्होंने आपदा प्रबंधन के विकेंद्रीकरण का आह्वान करते हुए कहा कि राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय ढांचे मौजूद हैं, लेकिन ‘‘जिला स्तरीय आपदा प्रबंधन समितियां बड़े पैमाने पर निष्क्रिय बनी हुई हैं.’

पर्यावरण विद्वान विमल खवास ने कहा कि यह त्रासदी चरम जलवायु घटनाओं के आवर्ती पैटर्न से मेल खाती है, जो दशकों से इस क्षेत्र को परेशान कर रही है. जवाहरलाल नेहरू (जेएनयू) के पूर्वोत्तर भारत अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर खवास ने कहा, ‘‘बस्तियां सीमांत क्षेत्रों में फैल गयी हैं, जहां निर्माण की अनुमति कभी नहीं दी जानी चाहिए थी. भूमि उपयोग नियमों के कमजोर क्रियान्वयन, खासकर गोरखालैंड आंदोलन के बाद सुरक्षा मानदंडों का पालन किये बिना अनियंत्रित निर्माण और सड़क विस्तार को बढ़ावा मिला है.”

पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष दत्ता ने कहा कि बार-बार होने वाले भूस्खलन पूरे उत्तर बंगाल-सिक्किम क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक पर्यावरण प्रबंधन योजना की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं. उन्होंने कहा कई नदियों का तल अब आसपास के बसे हुए इलाकों से ऊंचा हो गया है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है.’

जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न हुआ नया खतरा : पर्यावरण विशेषज्ञ सत्यदीप छेत्री ने चेतावनी दी है कि पूर्वी हिमालय जलवायु परिवर्तन से जलवायु संकट के चरण में पहुंच गया है. उन्होंने उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से बस्तियों को स्थानांतरित करने और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का आग्रह किया. उन्होंने कहा, ‘‘दक्षिण ल्होनक हिमनद झील के पुनः भर जाने से नया खतरा उत्पन्न हो गया है, तथा सितंबर-अक्तूबर में अत्यधिक वर्षा होने से इस क्षेत्र के लिए एक खतरनाक नये जलवायु पैटर्न का संकेत मिलता है.’

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Published by: Akhilesh kumar singh

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