बुलडोजर एक्शन पर TMC का धरना, नहीं पहुंचे ममता बनर्जी के 46 विधायक

TMC Protest: कालीघाट में हुई चर्चाओं में पार्टी के कुछ वर्गों के भीतर चुनाव के बाद नेतृत्व के राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर व्यापक चिंता भी झलकती है. इस पृष्ठभूमि में बुधवार का विरोध प्रदर्शन केवल चुनाव बाद हिंसा और अतिक्रमण रोधी अभियानों के मुद्दे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रतीकात्मक महत्व भी माना गया.

TMC Protest: कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस का पहला राजनीतिक प्रदर्शन पूरी तरह फ्लाप रहा. इस पहले बड़े विरोध प्रदर्शन से पार्टी के कई विधायक नदारद दिखे. तृणमूल विधायकों का इस तरह गायब होना बंगाल में राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है. यह घटनाक्रम पार्टी के आंतरिक विचार-विमर्श के एक दिन बाद सामने आया है, जिसमें कथित तौर पर जनता से जुड़ने के लिए सड़क पर उतरने की राजनीति की ओर लौटने की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी.

प्रदर्शन में पहुंचे महज 35 विधायक

तृणमूल विधायकों के एक समूह ने बुधवार को विधानसभा परिसर में आंबेडकर प्रतिमा के पास “चुनावेत्तर हिंसा” और फेरीवालों को हटाने के अभियानों के खिलाफ धरना दिया. पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद यह पार्टी का पहला समन्वित आंदोलन था. इस प्रदर्शन में शोभनदेब चट्टोपाध्याय, नयना बनर्जी, कुणाल घोष और ऋतब्रत बनर्जी शामिल थे. हालांकि, 80 विधायकों में से केवल 35 ही कार्यक्रम में पहुंचे. इसके बाद राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित मतभेदों को लेकर अटकलें तेज हो गईं है. यह ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी चुनावी हार के बाद खुद को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रही है.

शोभनदेब ने दी सफाई

विपक्ष के नेता पद के लिए पार्टी की पसंद माने जा रहे शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने आंतरिक कलह की अटकलों को खारिज किया है. उन्होंने कहा कि कई विधायक संगठनात्मक जिम्मेदारियों और अन्य व्यावहारिक कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके. चट्टोपाध्याय ने कहा- आज के कार्यक्रम में करीब 35 विधायक मौजूद थे. कई विधायक चुनाव बाद हिंसा प्रभावित इलाकों में कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त थे, इसलिए वे नहीं आ सके. इसके अलावा कार्यक्रम की सूचना सिर्फ एक दिन पहले दी गई थी, ऐसे में दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले विधायकों के लिए पहुंचना मुश्किल था.

लोगों से जुड़ने की दी गयी थी सलाह

इस विरोध प्रदर्शन को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह कालीघाट में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के एक दिन बाद आयोजित किया गया. पार्टी सूत्रों के अनुसार, बैठक में कई विधायकों ने कहा था कि तृणमूल कांग्रेस केवल रणनीतिक बैठकों के जरिए खुद को पुनर्स्थापित नहीं कर सकती और उसे जमीनी स्तर पर लोगों से दोबारा जुड़ने की जरूरत है.

पार्टी नेतृत्व की कथित अनुपस्थिति

पार्टी सूत्रों के अनुसार, पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की उपस्थिति में मंगलवार को हुई बैठक में कुछ विधायकों ने चुनाव में हार के बाद सड़क आंदोलन से पार्टी नेतृत्व की कथित अनुपस्थिति पर चिंता व्यक्त की. कई विधायकों ने कथित तौर पर कहा कि बंद कमरों में बैठकें करना उस पार्टी के लिए मददगार नहीं होगा, जो अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को फिर से हासिल करना चाहती है.

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आंदोलनों के जरिए बनी पार्टी है तृणमूल

तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान लंबे समय तक आंदोलनों के जरिए बनी रही है. सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों से लेकर वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ सड़क पर चलाए गए अभियानों तक, पार्टी की राजनीति में जन आंदोलनों की अहम भूमिका रही है. तृणमूल विधायकों ने विधानसभा में बी आर आंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष धरना दिया. उन्होंने बेदखली अभियान, बुलडोजर से इमारतें ढहाने और चुनाव बाद कथित हिंसा का विरोध किया. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल विधायकों के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में अपेक्षाकृत कम उपस्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पार्टी लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद विपक्षी दल की भूमिका में खुद को कितनी प्रभावी ढंग से ढाल पाती है.

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Published by: Ashish Jha

डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.

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