मतदाता सूची की हर गड़बड़ी के लिए डीइओ होंगे जिम्मेदार : चुनाव आयोग

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर चुनाव आयोग ने इस बार जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीइओ) यानी जिलाधिकारियों पर सख्ती बढ़ा दी है.

By BIJAY KUMAR | January 12, 2026 11:15 PM

कोलकाता.

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर चुनाव आयोग ने इस बार जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीइओ) यानी जिलाधिकारियों पर सख्ती बढ़ा दी है. आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि वोटर लिस्ट में एक भी अवैध नाम नहीं रहना चाहिए और न ही किसी वैध मतदाता का नाम सूची से हटना चाहिए. चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार, प्रत्येक जिले में डीइओ को स्वयं निगरानी करते हुए मतदाता सूची की गहन जांच करनी होगी. यह पूरी प्रक्रिया वर्ष 2002 की मतदाता सूची में उपलब्ध लिंकिंग के आधार पर की जायेगी. यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी सामने आती है, तो उसे सीधे तौर पर संबंधित डीइओ की निगरानी में कमी मानी जायेगी. राज्य के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी (अतिरिक्त सीइओ) ने पत्र के माध्यम से सभी डीइओ को सूचित किया है कि चुनाव आयोग चार रोल ऑब्जर्वर भेज रहा है. ये ऑब्जर्वर कभी सीइओ कार्यालय में बैठकर और कभी जिलों का दौरा कर ड्राफ्ट वोटर लिस्ट की जांच करेंगे. यदि उनकी जांच में गंभीर विसंगतियां पायी जाती हैं, तो यह माना जायेगा कि संबंधित डीइओ की ओर से उचित निगरानी नहीं की गयी. इसी को ध्यान में रखते हुए आयोग ने सभी जिलों में अभी से विशेष टीम गठित कर गणना फॉर्म और मतदाता विवरण की जांच कराने की सलाह दी है. लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी और अनमैप्ड मतदाताओं को लेकर सामने आये राजनीतिक विवादों पर भी चुनाव आयोग ने नाराजगी जतायी है. मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने इसके लिए राज्य प्रशासन के एक हिस्से और कुछ राजनीतिक रूप से प्रभावित बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ), इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (इआरओ) और अतिरिक्त इआरओ को जिम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि पूरे कार्य की ठीक से निगरानी नहीं हुई, जिसमें डीइओ की भी भूमिका रही है. इसके बाद चुनाव आयोग ने बीएलओ से लेकर डीइओ तक सभी स्तरों पर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. आयोग ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दल चाहे जो भी आरोप लगायें, चुनाव आयोग की नीति बिल्कुल साफ है- न तो किसी वैध मतदाता का नाम कटना चाहिए और न ही किसी अवैध मतदाता का नाम सूची में रहना चाहिए. इसी कारण डीइओ पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ बीएलओ को ऐप के माध्यम से भेजी गयी गाइडलाइंस में भी स्पष्ट निर्देश दिये गये हैं.

निर्देशों के अनुसार, वर्ष 2002 की एसआइआर सूची में नाम होने के बावजूद जिन मतदाताओं की किसी कारणवश मैपिंग नहीं हो पायी है, उनकी पूरी जानकारी एकत्र कर अपलोड करनी होगी और उसका सत्यापन भी करना होगा. यदि तकनीकी कारणों से मैपिंग नहीं हुई है, तो ऐसे मामलों में मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाने की आवश्यकता नहीं होगी. उस स्थिति में बीएलओ को स्वयं संबंधित मतदाता के घर जाकर दस्तावेजों की जांच करनी होगी और जानकारी दोबारा अपलोड करनी होगी. हालांकि, आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘प्रोजेनी मैपिंग’ से जुड़े मामलों में मतदाताओं को अनिवार्य रूप से सुनवाई के लिए बुलाया जायेगा.

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