सर्दी में मकालु फतह की ओर बढ़े पियाली बसाक के कदम

चंदननगर की पर्वतारोही पियाली बसाक इस समय विश्व की सबसे चुनौतीपूर्ण मानी जाने वाली शीतकालीन मकालु पर्वतारोहण अभियान पर हैं. पियाली ने माकालु बेस कैंप से बताया कि यदि यह अभियान सफल रहा, तो वह शीतकाल में मकालु शिखर फतह करने वाली दुनिया की पहली महिला पर्वतारोही बनेंगी.

बेस कैंप से समिट की तैयारी बेहद ठंड और तेज हवाओं के बीच चुनौतीपूर्ण अभियान

प्रतिनिधि, हुगली

चंदननगर की पर्वतारोही पियाली बसाक इस समय विश्व की सबसे चुनौतीपूर्ण मानी जाने वाली शीतकालीन मकालु पर्वतारोहण अभियान पर हैं. पियाली ने माकालु बेस कैंप से बताया कि यदि यह अभियान सफल रहा, तो वह शीतकाल में मकालु शिखर फतह करने वाली दुनिया की पहली महिला पर्वतारोही बनेंगी. पियाली के अनुसार, शीतकालीन माकालु अभियान बेहद जोखिमभरा है. वर्तमान में बेस कैंप में हवा की गति 125 से 140 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि तापमान माइनस 40 से माइनस 55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है. ऊंचाई बढ़ने के साथ ठंड और ऑक्सीजन की कमी और भी गंभीर हो जायेगी. अत्यधिक ठंड के कारण टीम के सभी सदस्यों के नाक और गले में जलन की समस्या हो रही है. पियाली ने बताया कि मंगलवार से मकालु पर्वत के रूट की तलाश का कार्य शुरू किया जायेगा. मौसम की सटीक जानकारी के लिए स्विट्ज़रलैंड से लगातार वेदर रिपोर्ट ली जा रही है. यदि लगभग 10 दिनों तक मौसम अनुकूल रहा, तो समिट पूरा करने की योजना है. बेस कैंप तक पहुंचना भी आसान नहीं रहा. लगभग आठ से नौ घंटे तक पत्थरों पर छलांग लगाते हुए आगे बढ़ना पड़ा. वहां की बर्फ इतनी सख्त है कि लोहे की कीलें भी ठीक से नहीं जम पाती हैं. पियाली ने कहा, “जरा सी चूक जानलेवा हादसे का कारण बन सकती है.” गर्मियों में भी मकालु बेस कैंप अत्यंत कठिन माना जाता है, इसलिए यहां पर्यटक बहुत कम आते हैं. ऐसे दुर्गम स्थान पर शीतकालीन अभियान करना अपने आप में बड़ी चुनौती है. इस अभियान में दो कुक समेत कुल सात सदस्य शामिल हैं, जो शानु शेरपा की देखरेख में आगे बढ़ रहे हैं. आमतौर पर माकालु अभियान चार कैंप बनाकर पूरा किया जाता है. टीम का लक्ष्य है कि जल्द से जल्द समिट कर सुरक्षित वापस लौटे.

मकालु बेस कैंप 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जबकि माकालु पर्वत की कुल ऊंचाई करीब 28,000 फीट है. बेस कैंप में एक महीने तक रहने और भोजन की पूरी व्यवस्था की गयी है. पियाली ने यह भी बताया कि प्रकृति से संघर्ष के साथ-साथ उन्हें आर्थिक संघर्ष भी झेलना पड़ रहा है. इस अभियान पर लगभग 25 लाख रुपये का खर्च आ रहा है, जिसमें एजेंसी को नौ लाख रुपये पहले ही दिये जा चुके हैं. उन्होंने पूरा अभियान ऋण लेकर पूरा किया है.

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