खेती कर रची स्वावलंबन की नयी कहानी

नौकरी की तलाश छोड़ कर उन्होंने खेती को अपनाया और आज न सिर्फ खुद स्वनिर्भर हैं, बल्कि अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुके हैं.

कोलकाता/हल्दिया. पढ़े-लिखे होने के बावजूद जब नौकरी नहीं मिली, तो कई लोग निराश हो जाते हैं. लेकिन महिषादल के चांपी इलाके के संदीप माइति और उनकी पत्नी धरित्री माइति ने हालात को चुनौती में बदल दिया. नौकरी की तलाश छोड़ कर उन्होंने खेती को अपनाया और आज न सिर्फ खुद स्वनिर्भर हैं, बल्कि अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुके हैं. उनकी मदद से अब अन्य युवा भी खेती के जरिये खुद को आत्मनिर्भर बना रहे हैं. इसके लिए दंपती की ओर से उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. संदीप स्नातक हैं और धरित्री स्नातकोत्तर. वर्ष 2018 में कॉलेज के दिनों में संदीप एक कृषि सेमिनार में गये थे, जहां उन्हें मशरूम की खेती के बारे में जानकारी मिली. इसके बाद उन्होंने प्रशिक्षण लिया और छोटे स्तर पर मशरूम उत्पादन शुरू किया. शुरुआती दिनों में उत्पादन सीमित था, लेकिन मेहनत और सीख के साथ उन्होंने इसे आगे बढ़ाया. आज उनके घर के पास एक शेड में करीब 1300 बेड में मशरूम की खेती हो रही है. इससे प्रतिदिन लगभग 20 से 25 किलो मशरूम का उत्पादन होता है, कई दिनों में यह मात्रा और बढ़ जाती है. महीने की आय 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंच जाती है. मशरूम की बिक्री हल्दिया, महिषादल, नंदकुमार, तमलुक और कोलाघाट जैसे बाजारों में होती है. दंपती बताते हैं कि प्लास्टिक के पैकेट में भूसा भरकर उसमें बीज डाला जाता है और नमी बनाये रखने के लिए नियमित पानी का छिड़काव किया जाता है. 12 से 15 दिनों में फसल तैयार हो जाती है. एक बेड से 500 ग्राम से एक किलो तक मशरूम मिलता है. संदीप और धरित्री का मानना है कि पढ़ाई का मतलब सिर्फ नौकरी नहीं होता. फल-सब्जी, मशरूम, पशुपालन जैसे कामों से भी आत्मनिर्भर बना जा सकता है. सरकारी योजनाओं और ऋण की मदद से वे आगे अपने काम का दायरा बढ़ाकर राज्य के अन्य बाजारों तक पहुंचने का सपना देख रहे हैं. माइति दंपती की कहानी आज के युवाओं के लिए एक सकारात्मक संदेश है.

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Author: GANESH MAHTO

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