ओडिशा में खोजी गयी नयी मृदा निमेटोड प्रजाति

इस साल 18 जनवरी को एक्टा जूलॉजिका बुल्गारिका में ऑनलाइन प्रकाशित यह महत्वपूर्ण खोज इस कम अध्ययन वाले क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को उजागर करती है

By Prabhat Khabar News Desk | March 10, 2025 1:12 AM

कोलकाता. भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआइ) कोलकाता के वैज्ञानिकों ने ओडिशा के केन्दुझर जिले के डेक्कन प्रायद्वीपीय जैवभौगोलिक क्षेत्र में मिट्टी में रहने वाले निमेटोड, क्रासोलैबियम धृतिया की एक नयी प्रजाति की खोज की है. इस साल 18 जनवरी को एक्टा जूलॉजिका बुल्गारिका में ऑनलाइन प्रकाशित यह महत्वपूर्ण खोज इस कम अध्ययन वाले क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को उजागर करती है और मृदा पारिस्थितिकी तंत्र में निमेटोड की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है. नयी पहचान की गयी प्रजाति क्रासोलैबियम धृतिया का नाम भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की निदेशक डॉ धृति बनर्जी के सम्मान में रखा गया है, जो प्राणी विज्ञान और वर्गीकरण अनुसंधान में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए है. यह खोज डॉ देवव्रत सेन के नेतृत्व में एक शोध दल द्वारा की गयी थी, जिसमें डॉ जीपी मंडल और श्री संप्रित देब राय भी शामिल थे, जो जेडएसआई कोलकाता से थे. शोध का प्रिंट संस्करण एक्टा जूलॉजिका बुल्गारिका के मार्च के अंक में प्रकाशित होने वाला है. डॉ. धृति बनर्जी ने शोधकर्ताओं को बधाई दी और मिट्टी के नेमाटोड के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ये सूक्ष्म जीव, हालांकि अक्सर अनदेखा कर दिये जाते हैं, मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं और पोषक चक्र और कार्बनिक पदार्थों के अपघटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उनकी विविध भोजन आदतें संतुलित और स्वस्थ मिट्टी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. क्रैसोलैबियम धृतिया की विशेषता इसके मध्यम आकार के, पतले शरीर, गोल होंठ क्षेत्र, चौड़ी ओडोन्टोस्टाइल, लंबी ग्रसनी, इसकी मादा प्रजनन प्रणाली में विशिष्ट विशेषताएं और एक विशिष्ट पूंछ का आकार है. जबकि, क्रैसोलैबियम जीनस की भोजन आदतों का अभी भी अध्ययन किया जा रहा है, उनमें शिकारी और सर्वाहारी व्यवहार शामिल हैं. डॉ देवव्रत सेन ने बताया कि यह खोज नेमाटोड जैव विविधता की हमारी समझ में एक महत्वपूर्ण वृद्धि है. क्रासोलैबियम धृतिया के साथ दुनिया भर में ज्ञात क्रासोलैबियम प्रजातियों की कुल संख्या 39 हो गयी है, जिनमें से नौ अब भारत में दर्ज हैं. यह इन कम अध्ययन किये गये पारिस्थितिकी तंत्रों में निरंतर शोध के महत्व को उजागर करता है.

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