संविधान के तहत सूचना का अधिकार, नागरिकों का है मौलिक आधार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत सूचना का अधिकार, नागरिकों के लिए एक मौलिक अधिकार है. यह निर्णय भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने श्री कुलवाल बनाम जयपुर नगर निगम के मामले में दिया था. शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रदत्त अभिव्यक्ति और वाक् स्वतंत्रता में स्पष्ट रूप से सूचना का अधिकार निहित है.

कोलकाता.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत सूचना का अधिकार, नागरिकों के लिए एक मौलिक अधिकार है. यह निर्णय भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने श्री कुलवाल बनाम जयपुर नगर निगम के मामले में दिया था. शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रदत्त अभिव्यक्ति और वाक् स्वतंत्रता में स्पष्ट रूप से सूचना का अधिकार निहित है. 12 अक्तूबर को आरटीआइ 20 साल पूरे कर रहा है.

इस संबंध में कलकत्ता हाइकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता देबब्रत उपाध्याय ने प्रभात खबर के ऑनलाइन सवालों का जवाब देते हुए कहा कि जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को प्राधिकारियों और जनता के बीच पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए भारत के नागरिकों को सूचना से सशक्त बनाने के लिए लागू किया गया था. सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा तीन के तहत, प्रत्येक नागरिक को सूचना का अधिकार होगा. आवेदक द्वारा निर्धारित शुल्क का भुगतान करने के बाद, प्राधिकारी अनुरोधित सूचना यथाशीघ्र और किसी भी स्थिति में 30 दिनों के भीतर उपलब्ध करायेगा. सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा छह के तहत प्रदान किये गये प्रावधान के अनुसार, आवेदक किसी भी सूचना के अनुरोध के लिए कारण या यहां तक कि व्यक्तिगत विवरण देने के लिए बाध्य नहीं है.

सवाल : मैंने 2010 में एक जमीन रजिस्ट्री करवायी थी और तब से नगरपालिका का टैक्स भी जमा कर रहा हूं. लेकिन हमने जमीन का परचा (म्यूटेशन) नहीं कराया था. लेकिन अब उस जमीन पर किसी और ने म्यूटेशन कराया है, अब हमें क्या करना चाहिए?

-राहुल कुमार, टीटागढ़

जवाब : म्यूटेशन एक संबंधित विभाग में रिकॉर्ड रखने वाला दस्तावेज है, इसलिए यदि अधिकारी 2010 के पंजीकृत विलेख के अनुसार आपके नाम पर म्यूटेशन नहीं करते हैं, तो आप आरटीआइ के माध्यम से विभाग से उस व्यक्ति के बारे में सभी आवश्यक दस्तावेज की मांग करिये. इसके बाद आप उक्त म्यूटेशन पर सवाल उठाते हुए विभाग को एक पत्र लिखें और विभागीय अधिकारी से पूछें कि आपके नाम पर म्यूटेशन क्यों नहीं किया जाना चाहिए. यदि उत्तर नकारात्मक है, तो उचित न्यायालय, फोरम में उक्त आदेश को चुनौती दे सकते हैं.

सवाल : मेरे घर से मेरी संपत्ति की ऑरिजनल दलील और दस्तावेज खो गये हैं, मुझे क्या करना चाहिए?

-मुश्ताक अहमद, जगद्दल

जवाब : सबसे पहले तुरंत स्थानीय पुलिस थाने में जीडी दर्ज करायें, फिर स्थानीय समाचार पत्र में इसकी सूचना प्रकाशित करायें. तत्पश्चात संबंधित रजिस्ट्रार कार्यालय से दस्तावेजों के विलेख की प्रमाणित प्रति प्राप्त करें.

सवाल : मैंने एक बैंक से लोन लिया था, लेकिन मैं उसका भुगतान नहीं कर पाया. लोक अदालत के माध्यम से नोटिस मिला है, क्या लोक अदालत से केस खत्म करा सकते हैं और छूट मिलेगी?

-राजू मिश्रा, बंडेल

जवाब : अगर आपने किसी बैंक से लोन लिया है, तो वह आपको चुकाना ही होगा. अगर आपका ऋण खाता एनपीए हो गया है, तो लोक अदालत या राष्ट्रीय लोक अदालत के माध्यम से ऋण संबंधित वाद को खत्म करा सकते हैं. इसमें बैंक के अधिकारी रहेंगे और वन टाइम सेटलमेंट करने से बैंक के प्रावधानों के अनुसार विशेष छूट मिल सकती है.

सवाल : मेरी जमीन पर कुछ लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है. इस बारे में अधिकारियों को आवेदन दिये तीन माह हो गये हैं, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.

-संतोष कुमार शर्मा, हावड़ा

जवाब : आवेदन के संदर्भ में पुनः अधिकारियों से मिल कर पत्र दें और कार्रवाई का अनुरोध करें. सुनवाई नहीं होने पर आवेदन की प्रगति के संबंध में सूचना अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन करें और सूचना का इंतजार करें. सूचना न देने पर उसके वेतन से राशि कटौती हो सकती है.

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Published by: Bijay kumar

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