कोलकाता
. सत्ता में रहने के 15 वर्ष बाद सत्ता-विरोधी लहर का सामना करते हुए और संगठन के भीतर संतुलित पीढ़ीगत बदलाव की कोशिश के बीच तृणमूल कांग्रेस राज्य विधानसभा चुनाव में अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित सामाजिक गठजोड़, मजबूत जमीनी संगठन और ममता बनर्जी के नेतृत्व के सहारे मैदान में उतर रही है. हालांकि, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) ने चुनावी परिदृश्य बदल दिया है. वर्ष 2011 से राज्य की सत्ता में रही तृणमूल के लिए इस बार का चुनाव कड़ी परीक्षा है. उसे अब आक्रामक हो चुकी भाजपा की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. चुनाव अब कल्याणकारी राजनीति, बेरोजगारी और पहचान की राजनीति के मुद्दों पर केंद्रित हो गया है. 15 साल की सत्ता के बाद पार्टी को स्थानीय प्रशासन से असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोप और गुटबाजी जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है. इसी के तहत तृणमूल ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट कर उम्मीदवारों में बड़े पैमाने पर बदलाव किया है.क्या कहना है तृणमूल प्रवक्ता का : तृणमूल के वरिष्ठ नेता जयप्रकाश मजूमदार ने कहा कि पार्टी की चुनावी ताकत चुनावों में लगातार बढ़ती जा रही है, जो उसके कल्याणकारी कार्यक्रमों और जमीनी स्तर के शासन मॉडल के प्रभाव को दर्शाती है. जयप्रकाश मजूमदार ने कहा कि जब लोगों को लगता है कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है, तो यह चिंता अन्य राजनीतिक मुद्दों पर हावी हो सकती है.
क्या कहना है प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का : इस संबंध में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि बंगाल में इस बार तृणमूल कांग्रेस सरकार की वापसी नहीं होगी. उसकी विदाई तय है. आगामी चुनाव में भाजपा जीत हासिल कर सत्ता में आयेगी. उन्होंने कहा कि राज्य की जनता तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार, तुष्टीकरण की नीति व कानून व्यवस्था ही बदहाल स्थिति से त्रस्त हो गयी है और वह बदलाव चाहती है.