करोड़ों की धोखाधड़ी के मामले में इडी ने 15.47 करोड़ की अचल संपत्ति की कुर्क

धोखाधड़ी मामले में धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत मेसर्स डेल्टा लिमिटेड और अन्य से जुड़ी करीब 15.47 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है.

संवाददाता, कोलकाता

प्रवर्तन निदेशालय (इडी), कोलकाता क्षेत्रीय कार्यालय ने करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी मामले में धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत मेसर्स डेल्टा लिमिटेड और अन्य से जुड़ी करीब 15.47 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है. साथ ही केंद्रीय जांच एजेंसी डेल्टा लिमिटेड और सात अन्य के खिलाफ महानगर स्थित स्पेशल पीएमएलए कोर्ट के समक्ष अंतिम अभियोजन शिकायत भी दायर की है. इस बात की जानकारी इडी द्वारा शुक्रवार को दी गयी है.

इडी ने वेतन से नियमित कटौती के बावजूद भविष्य निधि (पीएफ) जैसे वैधानिक बकाया का भुगतान न करने का आरोप लगाने वाली विभिन्न रिट याचिकाओं में जारी कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देश पर हेयर स्ट्रीट थाने में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर जांच शुरू की. उक्त प्राथमिकी में मेसर्स डेल्टा लिमिटेड और अन्य के खिलाफ कथित आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और श्रमिकों के भविष्य निधि कटौती के दुरुपयोग का आरोप है. इडी की जांच से पता चला है कि मेसर्स डेल्टा लिमिटेड और उसकी सहयोगी संस्थाओं के लगभग 800 कर्मचारियों को उनके भविष्य निधि ट्रस्ट (डेल्टा जूट एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड वर्कर्स प्रोविडेंट फंड ट्रस्ट) का दुरुपयोग करके धोखा दिया गया था. कंपनी को इपीएफ अधिनियम के तहत छूट प्राप्त थी, जिसके तहत वह अपने ट्रस्ट के माध्यम से पीएफ राशि का प्रबंधन कर सकती थी. इस ट्रस्ट का उद्देश्य कर्मचारियों के लाभ के लिए उनके पीएफ धन का उचित निवेश करके स्वतंत्र रूप से कार्य करना था. हालांकि, इसका उल्लंघन करते हुए, आपराधिक षड्यंत्र के तहत, पेशेवरों या फंड मैनेजरों के बजाय कर्मचारियों को ट्रस्टी नियुक्त किया गया था. ये कर्मचारी केवल प्रबंधन के निर्देशों के अनुसार कार्य करते थे और उनका कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं था. वर्षों से, नियमों के निरंतर उल्लंघन और वित्तीय घाटे के कारण 2014 में छूट रद्द कर दी गयी थी.

इसके बाद जब अदालती मामला चल रहा था, तब भी कंपनी के कर्मचारियों के वेतन से पीएफ काटा गया, लेकिन उसे न तो ट्रस्ट में और न ही पीएफ प्राधिकरणों के पास जमा किया गया. आरोप है कि कंपनी ने जानबूझकर कर्मचारियों के वेतन से काटे गए वैधानिक अंशदान को जमा करने से परहेज किया. बाद में उक्त राशि का इस्तेमाल अवैध तरीके से ऋणों की अदायगी, व्यावसायिक खर्चों को पूरा करने और संपत्ति लेनदेन कामों के लिए इस्तेमाल किया गया. इस मामले में अपराध से प्राप्त कुल आय (पीओसी) 15.47 करोड़ रुपये है.

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