IPAC ED Raid: बंगाल सीएम ने की गलत परंपरा की शुरुआत, ममता बनर्जी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा है कि बंगाल की मुख्यमंत्री ने जो किया है वह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है. यह गलत परंपरा की शुरुआत है और ऐसा अन्य मुख्यमंत्री भी ऐसा कर सकते हैं.

Supreme Court: कोलकाता/ नई दिल्ली. IPAC Raid मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सख्त टिप्पणी की है. न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा- किसी मुख्यमंत्री को जबरन उस जगह में घुसते देखना सुखद नहीं है, जहां केंद्रीय जांच एजेंसी जांच कर रही है. अगर अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 226 के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा सकता, तो फिर क्या किया जा सकता है? कल कोई दूसरा मुख्यमंत्री भी यही कर सकता है.

ईडी के अधिकार को चुनौती

इसके बाद राज्य सरकार के वकील ने कहा- हम कह रहे हैं कि केंद्र सरकार इस मामले में मुकदमा दायर कर सकती है. लेकिन सीआईडी ​​या ईडी जैसी कोई भी एजेंसी नहीं. अगर वे ऐसा करते हैं, तो संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में पांच न्यायाधीशों की पीठ गठित करनी होगी और ऐसी एजेंसियों की शक्तियों का पुनर्निर्धारण करना होगा.

राज्य सरकार ने फिर मांगा समय

बुधवार को राज्य सरकार ने एक बार फिर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से समय मांगा है. राज्य के वकील कपिल सिबल ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारी की पीठ के समक्ष समय की मांग करते हुए याचिका दायर की. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- समय बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है. मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप हैं. न्यायाधीश ने राज्य सरकार को याद दिलाया कि अदालत पहले ही चार सप्ताह का समय दे चुकी है. वरिष्ठ वकील कपिल सिबल ने कहा- हम जवाब दाखिल करना चाहते हैं.

सॉलिसिटर जनरल ने बताया समय की बर्बादी

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- यह बहुत अजीब बात है कि मुख्यमंत्री केंद्रीय एजेंसी की जांच में दखल दे रही हैं. चार हफ्ते बीत जाने के बाद भी वे कुछ जमा करने के लिए समय मांग रहे हैं. तब राज्य के वकील श्याम दीवान ने तर्क दिया- हमें अपना बयान जमा करने का समय नहीं मिल रहा है. इस पर न्यायाधीश ने कहा कि समय बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि चार हफ्ते का समय पहले ही दिया जा चुका है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शिकायत की- जिस तरह मुख्यमंत्री ने जांच के दौरान जबरदस्ती दखल दिया है, वह बहुत ही ‘असामान्य’ है.

जांच के दौरान तीसरे पक्ष को अनुमति नहीं

इससे पहले, ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया था. हलफनामे में ईडी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राज्य पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा गार्डों के बीच आमने-सामने की झड़प से बचने के लिए ईडी अधिकारियों को तलाशी रोकनी पड़ी. हलफनामे में यह भी कहा गया था कि कोई भी जांच एजेंसी तलाशी के दौरान किसी तीसरे व्यक्ति को अंदर आने और सामान ले जाने की अनुमति नहीं दे सकती.

राज्य ने आपातकालीन विभाग के मामले पर सवाल उठाए

सरकारी वकील श्याम दीवान ने ईडी के मामले की स्वीकार्यता पर सवाल उठाकर अपनी दलील दी.

  • राज्य के वकील ने कहा कि ईडी एक न्यायिक संस्था नहीं है, इसलिए वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकती. दूसरे, यदि ईडी के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की कोई संभावना नहीं है, तो अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका स्वीकार्य नहीं है. यहां सवाल यह है कि क्या ईडी याचिका दायर कर सकती है या नहीं.
  • राज्य: अनुच्छेद 32 के अनुसार, किसी नागरिक, व्यक्ति या कानूनी निगम निकाय को संविधान के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार है. यदि ऐसा नहीं है, तो यह मामला दायर नहीं किया जा सकता.
  • राज्य: पीएमएलए के अनुसार शक्तियां और जिम्मेदारियां दी गई हैं। लेकिन एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कानूनी वैधता नहीं दी गई है, जिसके आधार पर ईडी मामले दर्ज कर सके.
  • संविधान के अनुच्छेद 300 के अनुसार, भारत सरकार या कोई भी राज्य सरकार मौलिक अधिकारों से संबंधित प्रश्न उठाते हुए मामला दर्ज कर सकती है, लेकिन ईडी जैसी एजेंसी ऐसा नहीं कर सकती.
  • अनुच्छेद 131 में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कोई भी सरकारी एजेंसी मुकदमा कैसे दायर कर सकती है. शक्तियों का यह विभाजन संघीय संरचना में सरकार के प्रशासन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
  • जब सरकार कोई मुकदमा दायर करती है, तो उसे कई पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक विशिष्ट प्रक्रिया का पालन करना होता है. यदि कोई सरकारी एजेंसी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए अदालत में जाती है, तो संघीय संरचना और संवैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं.

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कोर्ट ने दे रखा है अंतरिम आदेश

इससे पहले, अदालत ने अंतरिम आदेश में राज्य को 8 जनवरी की घटना के सभी सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था. इन प्रक्रियाओं को सुनिश्चित करने के लिए समय की भी आवश्यकता थी. शीर्ष अदालत ने राज्य को समय दिया. आज एक और सुनवाई हुई. राज्य ने फिर से समय मांगा. राज्य ने सवाल उठाए कि ईडी ने जवाबी मामला क्यों दायर किया, इसके पीछे क्या तर्क है.

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By Ashish Jha

डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.

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