सोनारपुर हमला अभिषेक बनर्जी की अग्नि परीक्षा, जन-आक्रोश को ममता की तरह सहानुभूति में बदल पायेंगे ‘भाईपो’?

Abhishek Banerjee Sonarpur Attack: अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हुआ हमला उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ है. क्या वे ममता बनर्जी की तरह संघर्ष से अपनी पहचान बना पायेंगे? पढ़ें जवाहर सरकार और मैदुल इस्लाम का विशेष विश्लेषण.

Abhishek Banerjee Sonarpur Attack: पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को सोनारपुर की सड़कों पर जो कुछ भी हुआ, वह महज एक हिंसक घटना नहीं, अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक भविष्य का निर्णायक मोड़ (Turning Point) साबित हो सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब तक सत्ता के सुरक्षा कवच और ममता बनर्जी के साये में राजनीति करने वाले अभिषेक को पहली बार उस कड़वी हकीकत का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी बुआ ममता बनर्जी ने 1980 के दशक में अपनी पहचान बनायी थी. क्या अभिषेक इन पत्थरों और जूतों को अपने लिए जन-सहानुभूति की सीढ़ी बना पायेंगे?

सत्ता की ‘मखमली राह’ से ‘संघर्ष के कांटों’ तक

अभिषेक बनर्जी की अब तक की यात्रा ममता बनर्जी से बिल्कुल अलग रही है. ममता की राजनीति विपक्ष की सड़कों और पुलिस की लाठियों के बीच गढ़ी गयी थी. इसके विपरीत, अभिषेक ने हमेशा एक सत्तारूढ़ दल के ‘नंबर-2’ नेता के रूप में काम किया, जहां उन्हें संगठनात्मक और प्रशासनिक सुरक्षा प्राप्त थी.

अभिषेक ने पहली बार चखा जन-विरोध का स्वाद

सोनारपुर में उन पर हुए पथराव और अंडे फेंकने की घटना ने उन्हें उस पब्लिक आउटरेज के सामने ला खड़ा किया है, जिसे प्रशासनिक अधिकार से नियंत्रित नहीं किया जा सकता.

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कुर्मी आंदोलन की वो गलती और 2026 का सबक

विश्लेषकों ने अभिषेक बनर्जी के पुराने अनुभवों को जोड़ते हुए एक बड़ा इशारा किया है. मई 2023 में झाड़ग्राम में कुर्मी आंदोलनकारियों ने उनके काफिले को रोका था. उस समय अभिषेक ने उस आक्रोश को शायद गंभीरता से नहीं लिया था. उस आक्रोश को नजरअंदाज करने का परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को कुर्मी बहुल जिले की चारों सीटों पर करारी हार झेलनी पड़ी. सोनारपुर की घटना बता रही है कि अब जनता की नाराजगी किसी एक पॉकेट तक सीमित नहीं है.

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जवाहर सरकार बोले- वास्तविकता से पहला साक्षात्कार

टीएमसी के पूर्व सांसद और राज्यसभा सदस्य जवाहर सरकार ने इस स्थिति को बेहद दिलचस्प बताया है. उनका कहना है कि ममता बनर्जी 1980 से जिन कठिनाइयों और जनता के गुस्से से जूझ रही हैं, अभिषेक के लिए वह अनुभव अभी शुरू हुआ है. यह उनकी अग्नि परीक्षा है. अब यह देखना होगा कि वह इस ‘अग्नि’ में जलकर खाक होते हैं या कुंदन बनकर निकलते हैं.

विरासत बनाम संघर्ष : मैदुल इस्लाम का नजरिया

राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम के मुताबिक, अभिषेक पर हमेशा आरोप लगा है कि उनकी ताकत विरासत (Heritage) से मिली है, न कि संघर्ष (Struggle) से.

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लचीलेपन की जरूरत, खतरा भी कम नहीं

अगर अभिषेक बनर्जी इस हमले के बाद पीछे नहीं हटते और विरोध करने वाली जनता के साथ जुड़ाव जारी रखते हैं, तो वे वह गुण हासिल कर सकते हैं, जो विरासत में नहीं मिल सकता. और वह है आम जनमानस में जगह बनाना. इस्लाम ने चेतावनी दी कि अगर अभिषेक इस घटना को एक सामान्य हमला मानकर छोड़ देते हैं और विमर्श (Narrative) को बदलने में विफल रहते हैं, तो यह उनके लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम बन सकता है.

Abhishek Banerjee Sonarpur Attack: क्या अभिषेक बनेंगे दूसरे ‘ममता बनर्जी’?

एक हमले का शिकार होना और उस हमले के बाद और भी ताकतवर होकर उभरना- इन दोनों के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है. ममता बनर्जी ने हमेशा राजनीतिक हमलों को जन-सहानुभूति में बदलकर जीत हासिल की. अब गेंद अभिषेक बनर्जी के पाले में है. क्या वह सोनारपुर के मलबे से एक नया ‘जन नेता’ बनकर उभरेंगे या यह विरोध उनके लिए पतन की शुरुआत साबित होगा?

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Published by: Mithilesh Jha

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