बंगाल में डूबने से रोज जाती है 25 लाेगों की जान

जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ की रिपोर्ट में उजागर हुई राज्य की भयावह स्थिति

कोलकाता. बंगाल में नदी, तालाब या जलाशयों में डूबने से हर दिन औसतन 25 लोगों की जान चली जाती है. चौंकाने वाली बात यह है कि इन मौतों में लगभग 50 प्रतिशत पीड़ित 18 साल से कम उम्र के होते हैं. विश्व जल डूब रोकथाम दिवस के अवसर पर जारी एक नये अध्ययन में यह चिंताजनक स्थिति सामने आयी है. यह अध्ययन जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ ने किया है, जिसे अब तक का देश का सबसे बड़ा सामुदायिक-स्तर का डूबने पर आधारित सर्वे बताया गया है. इस अध्ययन में राज्य के सभी 23 जिलों की कुल 1.80 करोड़ आबादी को शामिल किया गया और लगभग 15 हजार लोगों से जानकारी जुटायी गयी. रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में हर साल औसतन 9,191 लोग डूब कर अपनी जान गंवाते हैं, जो पहले जारी किये गये आधिकारिक आंकड़ों से तीन गुना ज्यादा है.

रोकथाम के उपाय मौजूद, पर जमीनी स्तर पर नहीं

विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारत के डॉ बी मोहम्मद असील ने बताया कि जहां एक ओर दुनियाभर में डूबने से होने वाली मौतों में 20 वर्षों में 38 प्रतिशत की कमी आयी है, वहीं निम्न और मध्यम आय वाले देशों की स्थिति अब भी चिंताजनक है. उन्होंने कहा कि डूबने से बचाव के प्रभावी उपाय मौजूद हैं, अब जरूरत है उन्हें नीति और जमीनी स्तर पर लागू करने की. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अधिकांश मामलों में बचाव के प्रयास या तो नहीं किये गये या फिर गलत तरीके से किये गये. कई बार अवैज्ञानिक तरीके जैसे उल्टी कराना या बच्चे को उल्टा घुमाना अपनाया गया. केवल 10 प्रतिशत मामलों में सही सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) दी गयी और सिर्फ 12 प्रतिशत मामलों में चिकित्सकीय सहायता ली गयी.

रोकथाम के लिए सुझाव

रिपोर्ट में तालाबों और जलाशयों के चारों ओर बाड़ लगाने, सामुदायिक स्तर पर सीपीआर व बचाव प्रशिक्षण देने और बच्चों को प्रारंभिक तैराकी प्रशिक्षण देने जैसे उपाय सुझाये गये हैं, क्योंकि 90 प्रतिशत मामलों में पहला रेस्पॉन्डर कोई आम ग्रामीण ही होता है, ऐसे में ग्रामीणों को प्रशिक्षित करना बेहद जरूरी बताया गया है.यह अध्ययन ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रॉपीज़ और चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट (सीआइएनआइ) के सहयोग से किया गया है. सीआइएनआइ के नेशनल एडवोकेसी ऑफिसर सुजय राय ने कहा : ये सभी मौतें 100 प्रतिशत रोकी जा सकती हैं. अगर बच्चों पर थोड़ी-सी निगरानी रखी जाये, तो हर जान बचायी जा सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि 25 मौतों का औसत आंकड़ा भी सतही हो सकता है, एक और गहराई से किया गया अध्ययन अभी और भी गंभीर तस्वीर पेश कर सकता है.

बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा

जॉर्ज इंस्टीट्यूट की डॉ मेधावी गुप्ता ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में डूबने की घटनाएं एक बड़ी त्रासदी बन चुकी हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में बच्चों की मौतों की रिपोर्टिंग नहीं होती, जिससे वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती. उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियां भी सही आंकड़े सामने आने से रोकती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, एक से नौ वर्ष के बच्चों पर डूबने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है. अकेले एक से दो वर्ष के बच्चों में यह खतरा 30 प्रतिशत ज्यादा होता है. हैरानी की बात यह है कि ज्यादातर हादसे दोपहर 12 से दो बजे के बीच और घर से महज 50 मीटर की दूरी पर होते हैं. साथ ही, 93 प्रतिशत मामलों में कोई वयस्क मौजूद नहीं होता, जब बच्चे डूबते हैं.

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Published by: Ganesh mahto

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