पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ ही शिल्पांचल और कोयलांचल की राजनीति में एक बार फिर पुराने ‘रोग’ उभरने लगे हैं.
जामुड़िया.
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ ही शिल्पांचल और कोयलांचल की राजनीति में एक बार फिर पुराने ””रोग”” उभरने लगे हैं.चुनाव से पहले जनता ने जिस सिंडिकेट राज, कटमनी और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रचंड बहुमत देकर भाजपा की नई सरकार बनाई थी, आज मतगणना के कुछ ही दिनों बाद वही मुद्दे फिर से चर्चा के केंद्र में हैं.अंतर बस इतना है कि चेहरे बदल रहे हैं, पर व्यवस्था वैसी ही दिख रही है.
वर्चस्व की होड़ : पार्किंग से लेकर साइडिंग तक नजर
सत्ता के गलियारों में अब उन लोगों की भीड़ बढ़ने लगी है जो जीते हुए प्रत्याशियों और उनके करीबियों के जरिए सिंडिकेट, पार्किंग टेंडर, औद्योगिक क्षेत्रों में अध्यक्ष-सचिव के पद और कोलियरियों में कोयला लोडिंग (लिफ्टिंग) का अधिकार पाने के लिए जोड़-तोड़ में जुटे हैं. भ्रष्टाचार खत्म होने की उम्मीद लगाए बैठी जनता अब इन गतिविधियों को देख हतप्रभ है.
चर्चा में तपसी रेलवे साइडिंग
इस पूरे घटनाक्रम में जामुड़िया का तपसी रेलवे साइडिंग विवादों का नया हॉटस्पॉट बन गया है. पहले इस साइडिंग पर पूर्व विधायक के पुत्र का प्रभाव माना जाता था, लेकिन सत्ता बदलते ही अब नए समीकरण बन रहे हैं. इसी बीच, साइडिंग क्षेत्र में कर्मियों के साथ मारपीट और हंगामे की खबरों ने तनाव बढ़ा दिया है. इस पूरे खेल में अंचल के एक बाहुबली का नाम प्रमुखता से उभरकर सामने आ रहा है. जानकारों के अनुसार, अंडाल क्षेत्र के नवनिर्मित रेलवे यार्ड और साइडिंग में भी पहले उनका प्रभाव देखा गया था, और अब तपसी क्षेत्र में उनकी बढ़ती गतिविधियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं.
अधर में कोयला व्यापारी : डीओ के बावजूद लोडिंग ठप
जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी खजाने में पैसा जमा करने के बावजूद डीओ होल्डर व्यापारियों का काम पिछले चार दिनों से ठप है. व्यापारियों का आरोप है कि उनके वाहनों को यह कहकर लौटाया जा रहा है कि जब तक नयी सरकार के ””कोयला लिफ्टरों”” के साथ तालमेल या समीकरण नहीं बैठ जाता, तब तक लोडिंग नहीं होगी. इस अनिश्चितता ने छोटे व मझोले व्यापारियों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है.
प्रशासन की चुप्पी और बढ़ती चुनौतियां
रेलवे साइडिंग तथा कोयला लिफ्टिंग से जुड़े करोड़ों रुपये के टर्नओवर के कारण वर्चस्व की यह लड़ाई हिंसक रूप ले सकती है,राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि नयी सरकार इन सिंडिकेट तत्वों पर लगाम लगाने में नाकाम रही, तो जनता का भरोसा टूटने में देर नहीं लगेगी. अब देखना यह है कि स्थानीय प्रशासन और नई सरकार इन ””शक्ति केंद्रों”” और अवैध दखलंदाजी पर कितनी सख्ती से अंकुश लगाती है, ताकि कानून-व्यवस्था और व्यापारिक माहौल सामान्य हो सके.
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