ऐतिहासिक रानीगंज कोयलांचल शहर का अस्तित्व बचाने के लिए ””रानीगंज बचाओ मंच”” की शुरू मुहिम अब निर्णायक मोड़ पर है. कोयला मंत्रालय के सचिव को भेजे गये पत्र और हाल ही में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (इसीएल) के सीएमडी के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद प्रबंधन ने आधिकारिक तौर पर मंच की चिंताओं का जवाब दिया है.
मंच की मुख्य चिंता : ओसीपी से शहर को खतरा
रानीगंज बचाओ मंच के संयुक्त सचिव गौतम घटक ने प्रमुखता से यह मुद्दा उठाया था कि शहर के चारों ओर जिस प्रकार कोयला निकालने के लिए ओपनकास्ट प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, उससे शहर के भूगर्भ का जल स्तर गिर जाएगा, चूंकि रानीगंज शहर नीचे से पानी के आधार पर टिका हुआ है, इसलिए ओसीपी होने से भू-धंसाव की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है और शहर का अस्तित्व मिट सकता है.हालांकि श्री घटक ने यह भी उल्लेख किया कि बीते 100 वर्षो में रानीगंज शहर में किसी तरह की भूधसान की घटना नहीं घटी है,पर अब ईसीएल प्रबंधन जिस तरह से महाबीर कोलियरी अंचल में एक निजी कंपनी को कोयला निकालने की अनुमति दी है,उससे इस शहर का भविष्य खतरे में है.
इसीएल का पक्ष : इसलिए जरूरी है ओपनकास्ट माइनिंग
मंच के पत्र पर संज्ञान लेते हुए कोयला मंत्रालय ने ईसीएल को जवाब देने का निर्देश दिया था.ईसीएल के महाप्रबंधक (सुरक्षा एवं बचाव) द्वारा जारी पत्र में ओसीपी को अपनाने के कई तकनीकी कारण बताए गए हैं जिनमे 200 साल पुराने अनियोजित खनन के कारण जमीन के नीचे कई खोखली जगहें हैं, जिनका कोई नक्शा नहीं है. ओसीपी इन रिक्तियों को भरकर भविष्य के धंसाव के जोखिम को खत्म करता है. पुरानी खदानों में लगी आग को बुझाने के लिए ओसीपी ही एकमात्र कारगर तरीका है ताकि जलते हुए कोयले को बाहर निकाला जा सके.भूमिगत खदानों को भरने के लिए नदी की बालू पर पर्यावरणीय प्रतिबंधों के कारण अब बालू की भारी कमी है, जिससे भूमिगत खनन मुश्किल हो गया है.
बैठक में लिये गये चार अहम निर्णय
16 जनवरी 2026 को सीएमडी और रानीगंज बचाओ मंच के बीच हुई बैठक में शहर की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दिए गए आश्वाशन के तहत महावीर कोलियरी अंचल में खनन परियोजनाएं केवल ईसीएल के आवंटित पट्टे क्षेत्र के भीतर ही होंगी. रानीगंज टाउनशिप के पास खनन से पहले एक विस्तृत माइन प्लान बनाया जाएगा, जिसमें सतह के बुनियादी ढांचे का पूरा ध्यान रखा जाएगा. ऐसी कोई भी गतिविधि नहीं की जाएगी जिससे शहर की जमीनी स्थिरता को खतरा हो. किसी भी नए खनन कार्य से पहले वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा और उसकी रिपोर्ट रानीगंज बचाओ मंच के साथ साझा की जाएगी.
इको-पार्क में बदलेगी जमीन
ईसीएल ने स्पष्ट किया कि ””कनकरेंट रिक्लेमेशन”” नीति के तहत खनन के बाद खाली हुए गड्ढों को तुरंत भरकर वहां तकनीकी और जैविक सुधार किया जाएगा. इसका उद्देश्य खनन के बाद जमीन को उसके मूल स्वरूप में लौटाना या उसे ””इको-पार्क”” के रूप में विकसित करना है. सच तो यह है कि रानीगंज बचाओ मंच की सक्रियता ने कोयला मंत्रालय और ईसीएल प्रशासन को शहर की सुरक्षा के प्रति जवाबदेह बनाया है. अब देखना यह होगा कि भविष्य में होने वाली खनन गतिविधियों में इन वादों को जमीनी स्तर पर कितना निभाया जाता है.
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