कुल्टी में सात साल पहले तीन अपर जूनियर हिंदी हाइस्कूलों को मान्यता, पर नहीं बना भवन तक

सरकार की ओर से ड्रॉपआउट को लेकर सर्वे का कार्य चल रहा है, जिसमें यह मुद्दा कितना उभर कर सामने आएगा? यह अनेकों के मन मे सवाल है.

दो स्कूलों में तीन-तीन स्थायी शिक्षकों के पद हुए आवंटित, निरीक्षकों ने एसएससी को नहीं भेजी शिक्षकों की मांग आसनसोल. जिला के विभिन्न इलाकों में प्रशासनिक व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण हिंदीभाषी विद्यार्थियों के स्कूल से ड्रॉपआउट होने का मामला गंभीर मामला बनकर सामने आ रहा है. सरकार की ओर से ड्रॉपआउट को लेकर सर्वे का कार्य चल रहा है, जिसमें यह मुद्दा कितना उभर कर सामने आएगा? यह अनेकों के मन मे सवाल है. ड्रॉपआउट विद्यार्थियों का सर्वे नियमित अंतराल पर होता है लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की उपेक्षा के कारण हिंदी माध्यम जूनियर हाइस्कूलों को मान्यता मिलने के बावजूद भी स्कूल भवनों का निर्माण नहीं हुआ. शिक्षक का पद आवंटन होने के बाद भी स्कूल निरीक्षकों ने शिक्षकों के रिक्त पद की मांग स्कूल सर्विस कमीशन से नहीं करने कारण शिक्षक भी नहीं मिला. कुल्टी इलाके में ऐसे तीन स्कूलों को वर्ष 2018 में वेस्ट बंगाल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन ने राज्य सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग की अनुशंसा पर मान्यता दी. लेकिन अबतक इन स्कूलों के भवन निर्माण के लिए फंड नहीं मिला, जिसके कारण स्कूल भवन ही नहीं बना. जबकि तीनों स्कूलों के लिए जमीन लोगों ने दान में दी. इसमें से एक स्कूल इलाके के निजी स्कूल के भवन में गेस्ट टीचर के सहयोग से चल रहा है. बाकी दो स्कूल भगवान भरोसे है और यह दोनों बालिका विद्यालय है. इस इलाके में यह स्कूल नहीं बनने के कारण बच्चियों को सात से आठ किलोमीटर दूर स्कूल में जाना होता है. सभी वहां तक नहीं पहुंच पाती है. साहित्यकार व एक्टिविस्ट सृंजय ने कहा कि यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ड्रॉपआउट की संख्या क्या होगी? भारी संख्या में बच्चे ड्रॉपआउट हो रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग सरकार के पास सही तरीके से नहीं होती है. अतिरिक्त जिलाधिकारी (शिक्षा) संजय पाल ने कहा कि इस विषय की जांच करके ही आगे कुछ कहा जा सकता है.

केस -1 : धेमोमेन कोलियरी हिंदी जूनियर हाइस्कूल को वर्ष 2018 में मिली मान्यता

धेमोमेन कोलियरी हिंदी जूनियर हाइस्कूल (कक्षा पांच से आठ) को वर्ष 2018 में मान्यता मिली. यहां स्थानीय शिक्षक पद आवंटित नहीं हुआ. यहां स्कूल के लिए विवेकानंद एजुकेशनल सोसाइटी ने एक बीघा जमीन दान में दिया. राज्य सरकार से फंड नहीं मिलने के कारण स्कूल भवन नहीं बना. इस इलाके में चार प्रायमरी स्कूल है. प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद यहां के आगे पढ़ाई जारी रखना एक चुनौती है. हालांकि यहां दो गेस्ट शिक्षकों की मदद से एक निजी स्कूल के ही भवन में ही अस्थायी रूप से उक्त स्कूल को चलाया जा रहा है. यहां से सबसे नजदीकी हाइस्कूल आठ किलोमीटर एनडी राष्ट्रीय विद्यालय है.

केस -2 : कुल्टी के केंदुआ पन्नालाल बिहारीलाल साव हिंदी गर्ल्स जूनियर हाइस्कूल का नहीं बना भवन

केंदुआ पन्नालाल साव बिहारीलाल साव हिंदी गर्ल्स जूनियर हाइस्कूल (कक्षा पांच से आठ) को वर्ष 2018 में मान्यता मिली. स्थानीय व्यक्ति प्रेमलाल साव ने स्कूल भवन के लिए आठ कट्ठा जमीन दान में दिया लेकिन सरकार से फंड नहीं मिलने के कारण भवन नहीं बना. इस स्कूल के लिए तीन शिक्षक का पद आवंटन किया गया था, जिसकी मांग एसएससी से नहीं करने के कारण शिक्षक भी नहीं मिला. इस इलाके के बच्चियों को कक्षा पांच की पढ़ाई के लिए नजदीकी स्कूल करीब सात किलोमीटर दूर है. सराकरी स्कूलों में जो विद्यार्थी आते हैं, उनमें से अधिकांश की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर होती है. इस स्थिति में सात किलोमीटर दूर बस से स्कूल जाना कितनी बच्चियों के लिए संभव हो पायेगा.

केस -3 : रांचीग्राम मोतीलाल तुलसीदास हिंदी गर्ल्स जूनियर हाइस्कूल का भवन निर्माण अधर में

कुल्टी इलाके के रांचीग्राम इलाके में रांचीग्राम मोतीलाल तुलसीदास हिंदी गर्ल्स जूनियर हाइस्कूल को वर्ष 2018 में मान्यता मिली. तीन शिक्षकों का पद आवंटन हुआ. स्कूल भवन के लिए स्थानीय सुमित अग्रवाल ने सात कट्ठा जमीन दान में दिया. राज्य सरकार से फंड नहीं मिलने के कारण भवन निर्माण नहीं हुआ, जिससे यहां स्कूल आरम्भ नहीं हो पाया. शिक्षकों की मांग भी एसएससी से नहीं हुई तो शिक्षक भी नहीं मिले. यहां के बच्चियों को भी कक्षा पांच की पढ़ाई के लिए सबसे नजदीकी स्कूल करीब छह किलोमीटर है.

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Published by: Ganesh mahto

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