कलाकारों ने पलाश संरक्षण की उठायी मांग बांकुड़ा. बसंत ऋतु में बांकुड़ा एक मनमोहक इको-टूरिज्म केंद्र में बदल जाता है. पलाश के फूल खिलते ही जिले के जंगल, पहाड़ और गांव ऐसे दिखते हैं मानो पेड़ों पर आग की लपटें लहर रही हों. जनवरी-फरवरी के दौरान हल्की ठंड और सुहानी हवा के बीच प्रकृति का यह रंगीन रूप पर्यटकों को आकर्षित करता है. पहाड़ियों और जलाशयों में दिखता अनोखा नजारा : शुशुनिया हिल्स वसंत में पलाश से ढककर और भी आकर्षक हो उठता है. पूरा पहाड़ लाल आभा में रंग जाता है. गंगडुआ जलाशय तक जाने वाले मार्ग के दोनों ओर पलाश के पेड़ों की कतारें दृश्य को मनोहारी बना देती हैं. पानी, जंगल और लाल फूलों का मेल इस स्थल को खास बनाता है. इसी तरह बारडी हिल्स, तालबेरिया जलाशय, मुकुटमणिपुर और झिलिमिली में भी पलाश की लालिमा प्रकृति को नया रूप देती है. घने जंगल, शांत जलाशय और पक्षियों की आवाज के बीच यह दृश्य पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण बनता है. सांस्कृतिक कार्यक्रमों से संरक्षण का संदेश : पिछले कुछ वर्षों से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से पर्यावरण कलाकार ‘पलाश बचाओ’ सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं. कलाकार पेड़ों के नीचे उसी रंग की साड़ी पहनकर गीत, नृत्य और नाटक प्रस्तुत करते हैं और संरक्षण का संदेश देते हैं. संगीता बिस्वास, एकता गंगोपाध्याय और स्वास्ति चटर्जी ने कहा कि जिले के प्राकृतिक पर्यटन स्थलों पर पलाश के वृक्षों का रोपण और संरक्षण जरूरी है. उनके अनुसार यदि इन क्षेत्रों में पलाश के जंगल सुरक्षित रखे जाएं तो बांकुड़ा वसंत में एक प्रमुख इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है.
बसंत में पलाश की लालिमा से दहका बांकुड़ा
जनवरी-फरवरी के दौरान हल्की ठंड और सुहानी हवा के बीच प्रकृति का यह रंगीन रूप पर्यटकों को आकर्षित करता है.
