आसनसोल : इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (इसीएल) की तीन नंबर घुसिक कोलियरी के क्वार्टर में जन्म लेने के बाद वकालत की पढ़ाई करने तथा तृणमूल कांग्रेस के आम कर्मी से शुरू कर आसनसोल नगर निगम के मेयर तक का सफर तय करने के दौरान जितेन्द्र तिवारी का जीवन काफी उथल पुथल का रहा है. लेकिन विकट से विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह पूरी निष्ठा के साथ किया है. उनके पिता साधु शरण तिवारी इसी कोलियरी में माइनिंग सरदार के रूप में कार्यरत थे.
10 जनवरी, 1974 को उनका जन्म हुआ. उनको दो भाई और एक विवाहिता बहन है. पिता व पिता तुल्य बड़े भाई का प्यार खो चुके हैं.
उन दोनों के निधन के बाद कई पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह उन्होंने किया है. स्थानीय डीएवी स्कूल से उन्होंने हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई पूरी की. इस स्कूल के कई शिक्षकों को इस समय भी वे पूरा सम्मान देते हैं. भले ही वे शिक्षक आसनसोल में रहनेवाले नवीनचंद्र सिंह हो या कोलकाता में रहनेवाले एचएन मिश्र हो. इन शिक्षकों को अपने छात्र पर गर्व भी है तथा उन्होंने कई समारोहों में इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया है.
स्नातक की परीक्षा उन्होंने स्थानीय बीबी कॉलेज से पूरी की. वकालत के लिए उन्होंने तत्कालीन बिहार यूनिवर्सिटी (मुज्जपरपुर) में पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने आसनसोल कोर्ट में वकील के रूप में प्रैक्टिस शुरू की. इसी दौरान 25 जून 1999 को उन्होंने अधिवक्ता चैताली के साथ विवाह किया. इस समय पति-पत्नी दोनों अधिवक्ता हैं तथा उनकी अकलौती बेटी पललवी तिवारी दसवीं कक्षा की छात्र है.
कोलियरी क्षेत्र में बचपन गुजारनेवाले हिंदीभाषी युवक की तरह श्री तिवारी भी काफी उच्श्रंख्ल स्वभाव के थे. वकालती के साथ-साथ समाजसेवा व राजनीति में भी दिलचस्पी लेते थे.
समाज विरोधी तत्वों के खिलाफ उन्होंने पत्रिका की प्रकाशन भी शुरू किया था. यह पत्रिका आम पत्रिका से काफी अलग थी. इसके बाद उन्होंने जब तृणमूल की राजनीति शुरू की तो उस समय पार्टी का जनाधार बहुत अधिक नहीं थी. लेकिन वे अपने गुट के कुछ युवकों के साथ अक्सरहां किसी न किसी मुद्दे पर विभिन्न कार्यालयों पर प्रदर्शन किया करते थे.
रानीगंज विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 2006 में उन्होंने पार्टी प्रत्याशी के रूप में चुनव भी लड़ा. यह अलग बात है कि आम मतदाताओं तक वे संसाधनों की कमी के कारण नहीं पहुंच पाये, लेकिन राजनीति उनकी समझ में आने लगी थी. इसके बाद उन्होंने कालीपहाड़ी इलाके में कोयला चोरी के खिलाफ आंदोलन करना शुरू किया. इसके कारण वे माकपा और पुलिस अधिकारियों की नजर में चढ़ने लगे. पुलिस प्रताड़ना की भी उन्हें शिकार होना पड़ा.
आसनसोल नगर निगम के वामपंथी बोर्ड के खिलाफ भी उन्होंने काफी आंदोलन किया तथा सक्रियता दिखायी. इसके बाद वर्ष 2009 में आसनसोल नगर निगम चुनाव हुआ. कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस ने मिल कर चुनाव लड़ा तथा परिणाम इस गठबंधन के पक्ष में आया. उन्हें नगर निगम का चेयरमैन बनाया गया. यही से उनके राजनीतिक जीवन में एक नया मोड़ आया.
नये बोर्ड में चेयरमैन जैसे संवैधानिक पद को विशेष अधिकार तत्कालीन मेयर तापस बनर्जी व मेयर परिषद ने दिया. उन्हों किसी भी शिकायत की जांच कराने का अधिकार मिला और उन्होंने बखूबी इसका उपयोग किया. पूरे बोर्ड के कार्यकाल में मेयर श्री बनर्जी व चेयरमैन श्री तिवारी की जोड़ी चर्चे में रही. पांच वर्षो के दौरान कई उतार-चढ़ाव उन्होंने देखा. इसी दौरान उन्होंने हिंदी अकादमी का गठन किया.
मेयर श्री बनर्जी अध्यक्ष व श्री तिवारी सचिव बने. हिंदी भवन की स्थापना हुई. मंत्री मलय घटक के नेतृत्व व उनकी पहल पर बीबी कॉलेज में हिंदी में एमए की पढ़ाई शुरू हुई. विभिन्न भाषाई साहित्यकारों को उचित सम्मान मिला.
सांस्कृतिक गतिविधियां चली. अपने कार्य के कारण ही वे नगर निगम के कर्मचारियों के बीच वे काफी लोकप्रिय रहे. कोई भी कर्मचारी अपनी विभागीय व व्यक्तिगत समस्या लेकर उनके पास आता था. वे बेहिचक उनका समाधान करते थे. संसदीय चुनाव में पार्टी ने दोला सेन को पार्टी प्रत्याशी बनाया. उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ उनका साथ दिया.
पूरी शक्ति लगा कर उनका प्रचार किया. भाजपा के प्रत्याशी व निवर्त्तमान सांसद व माकपा नेता वंशगोपाल चौधरी को अपने निशाने पर रखा. बाबुल के साथ उनकी राजनीतिक लड़ाई व्यक्तिगत लड़ाई तक पहुंच गयी. यहां तक कि बाबुल सुप्रियो ने उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने की सार्वजनिक घोषणा कर दी. सार्वजनिक मंचों पर भी वे श्री सुप्रियो के मुखर विरोधी बन कर सामने आये.
बोर्ड के चेयरमैन रहने के दौरान उन्होंने अपने वार्ड का सर्वाधिक विकास किया. अपने क्षेत्र में विरोधियों के अस्तित्व को समाप्त करने के लिए लगातार पहल की. क्षेत्र से जुड़े रहने के लिए कोलफील्ड उत्सव का आयोजन किया. आसपास के वार्डो में भी उनकी सक्रियता बनी रही.
बोर्ड की कार्यावधि समाप्त हो जाने के बाद उन्होंने खुद को अपने क्षेत्र तक ही सीमित कर लिया. उन्होंने लगातार मतदाताओं से संपर्क बनाये रखा तथा साढ़े चार हजार से अधिक मतों से जीत दर्ज की.
