टोटो और ऑटो की बाढ़ मे बह गये रिक्शा चालक
दुर्गापुर : पूरे देश के साथ शिल्पांचल में भी शहर के भीतर कभी आने-जाने का एकमात्र साधन माने जाने वाला सामान्य साइकिल रिक्शा अब लोगों की पसंद नहीं है. बढ़ते शहरीकरण और आधुनिकीकरण के इस बाजार में रिक्शे की जगह ऑटो, ई-रिक्शा जैसे आवागमन के साधनों ने ले ली है और ये साइकिल रिक्शा चालक मूक दर्शक बनते जा रहे है. देश के अन्य शहर की तरह शिल्पांचल में भी इन दिनो टोटो और ऑटो की बाढ़ सी आ गयी है.
शहर के विभिन्न इलाकों में इन्हें सवारी ढोते हुए आसानी से देखा जा सकता है. शहर में इनकी अधिकता का सीधा असर शहर में रिक्शा चलानेवालों की कमाई पर दिखने लगा है. कभी दिन भर में दो-तीन सौ रुपये से अधिक कमानेवाले आज बोहनी के लिए मोहताज हो रहे हैं, जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है. उन्हें परिवार चलाने में असुविधा हो रही है, जिसके कारण रिक्शा चालकों का अब पलायन भी शुरू हो चुका है.
बताया जाता है कि शहर में अधिकतर रिक्शा चलानेवाले बिहार और झारखंड के रहनेवाले हैं, जो शहर में रिक्शे से आमदनी कम होती देख अपने गांव घर में ही आमदनी का जरिया खोजने में लग गये हैं, लेकिन सरकार ने यह कभी नहीं सोचा कि डेवलपमेंट के जिस मॉडल के ज़रिए वह लोगों की जिंदगी को आसान बनाने की कोशिश में लगी हुई है, उस मॉडल का एक पहलू गरीब तबके के लिए बेरोजगारी व भूखमरी का कारण बन रहा है.
हालांकि यह सच है कि इससे रिक्शे पर सवारी करनेवाले कुछ आम लोगों को फायदा जरूर मिल रहा है, लेकिन यह बात भी सच है कि हमारी सरकारें अमूमन हकीकतों से दूर होती जा रही हैं. रोजगार की जितनी जरूरत ई-रिक्शा चालकों को है, जाहिर तौर पर उतनी ही जरूरत साइकिल रिक्शा चालकों को भी है. शहर में रिक्शा चलानेवाले योगेंद्र, नरेश, गणेश बताते हैं कि जब से यह ई-रिक्शा आया है हमारी आर्थिक हालत पहले से खराब हो गयी है.
हमारी कमाई लगातार घटती जा रही है. प्रशासन भी साथ नहीं देता. साइकिल रिक्शा चालक अपनी कठोर मेहनत के दम पर सवारियों को निर्धारित स्थान पर पहुंचाता है. ऊबड़-खाबड़ सड़क और कहीं-कहीं गड्ढे होने के चलते उसे गंदे पानी में भी उतर कर रिक्शे को खींचना पड़ता है. इन सबके चलते वे कुछ ज्यादा किराया लेते हैं. उनका कहना है कि हमलोगों के पास इतना पैसा भी नहीं है कि अपना ई-रिक्शा खरीद सकूं या दूसरा कुछ काम कर सकूं. अब किसी तरह घर परिवार चलाना है, कर भी क्या सकते हैं. कोई दूसरा काम आता नहीं है.
पता नहीं आगे हमारे परिवार का क्या होगा. पूरा परिवार गांव में रहता है. घर पर कमानेवाला अकेला हम लोग ही हैं. थोड़ी बहुत खेती बाड़ी है, जो परिवार चलाने के लिए नाकाफी है. उनका कहना है कि महंगाई इतनी बढ़ गयी है कि कुछ समझ में ही नहीं आता कि वो ख़ुद क्या खाये और घरवालों को क्या भेजे?
ऊपर से ये धंधा भी धीरे-धीरे चौपट होता जा रहा है. अपने मौजूदा हालातों का ज़िक्र करते हुए वह बताते हैं, ‘तीन-चार साल पहले तक अपनी कमाई में से कुछ रुपये घर भेज देता था, इन्हीं रुपये से वहां सबका गुज़र-बसर हो रहा था, लेकिन अब हमारी आमदनी पहले से भी कम हो गयी है. इसका एकमात्र कारण बैटरी वाला रिक़्शा है. ’बदलते समय, बढ़ती आमदनी और नयी तकनीक के कारण लोगों की सोच में भी भारी बदलाव देखने को मिला है और इसका सीधा असर इन रिक्शेवालों पर पड़ा है.
इधर सरकार का भी कोई ऐसा इरादा नज़र नहीं आता, जिससे साइकिल रिक्शा चालकों की सहूलियत का कोई रास्ता खुल सके. रिक्शावालों के मुताबिक अब लोग रिक़्शा के बजाय ई-रिक़्शा पर बैठना ज़्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि लोगों को जल्दी रहती है और उनका काम सस्ते में भी हो जाता है. ऐसे में इस पहिये के धीमी रफ़्तारवाला रिक़्शा को कोई नहीं पूछता.
