UP Temple: पवित्र सावन महीने के पावन अवसर पर संगम नगरी प्रयागराज के प्रमुख शिव मंदिरों में भोर से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है. तड़के मंगला आरती संपन्न होते ही मनकामेश्वर, सोमेश्वर और कोटेश्वर महादेव जैसे पौराणिक धामों में जलाभिषेक हेतु भक्तों की लंबी कतारें लग गईं. मान्यता है कि त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम ने ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति और अपनी यात्रा की सफलता के लिए इन स्थलों पर शिवलिंग की आराधना कर मनोकामनाएं पूर्ण की थीं.
सोमेश्वर धाम की महिमा
चंद्रदेव के रोग निवारण से जुड़ी सोमेश्वर धाम की महिमा, त्रिशूल के दिशा बदलने की अद्भुत परंपरा. अड़ैल स्थित सोमेश्वर महादेव सिद्धपीठ का पौराणिक इतिहास अत्यंत निराला है. महर्षि प्रजापति दक्ष के श्राप से मुक्ति पाने हेतु चंद्रदेव ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या करके शिव कृपा से आरोग्य प्राप्त किया था. 12 ज्योतिर्लिंगों के पुण्य फल देने वाले इस सिद्ध पीठ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मंदिर के शिखर पर स्थापित पावन त्रिशूल प्रति माह अपनी दिशा स्वतः बदल लेता है, जिसे देखने हेतु दूर-दूर से शिवभक्त प्रतिवर्ष प्रयागराज खिंचे चले आते हैं.
मनकामेश्वर मंदिर की मान्यता
पवित्र सावन मास में संगम तट पर स्थित प्रसिद्ध मनकामेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है. त्रेतायुग से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, संगम क्षेत्र में आगमन के दौरान भगवान श्रीराम ने माता सीता के साथ इस पावन धाम में जलाभिषेक कर अपनी आगे की यात्रा के निर्विघ्न और सफल होने की प्रार्थना की थी. भक्तों का अटूट विश्वास है कि श्रीराम की इसी भक्ति के कारण यह सिद्धपीठ 'मनकामेश्वर' नाम से प्रतिष्ठित हुआ, जहाँ सावन के महीने में शिव पूजन और जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
महाभारत कालीन लाक्षागृह
पौराणिक मान्यताओं के साथ-साथ लाक्षागृह से जुड़े पुरातात्विक तथ्य भी अब उजागर हो चुके हैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा बागपत के बरनावा और प्रयागराज के हंडिया में की गई खुदाई के दौरान 'पेंटेड ग्रे वेयर' अर्थात चित्रित धूसर मृदभांड के अवशेष प्राप्त हुए हैं. प्रसिद्ध पुरातत्वविदों के अनुसार यह विशिष्ट बर्तनों की संस्कृति सीधे तौर पर महाभारत काल से मेल खाती है, जो महाकाव्यों में वर्णित पांडवों के लाक्षागृह वाली घटना को ऐतिहासिक प्रामाणिकता प्रदान करती है.
