Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन भारतीय समाज में भाई-बहन के रिश्ते, स्नेह और विश्वास का पर्व है. सदियों से इस दिन बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और भाई उनकी सुरक्षा का संकल्प लेते हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में इस त्योहार से जुड़ी अपनी लोकपरंपराएं और मान्यताएं भी रही हैं. उत्तर प्रदेश के संभल जिले का बेनीपुर चक गांव इसी तरह की एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है, जहां रक्षाबंधन का पर्व सामान्य तरीके से नहीं मनाया जाता. इतिहास में छिपी इस परंपरा की कहानी, गांव के इस परंपरा को अलीगढ़ के अतरौली क्षेत्र से जुड़ी एक पुरानी पारिवारिक घटना और उसके बाद हुए पलायन से जोड़कर देखा जाता है.
जब राखी सिर्फ धागा नहीं, वचन का प्रतीक थी
भारतीय परंपरा में राखी को केवल एक धागा नहीं माना गया. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में यह भाई-बहन के बीच विश्वास, संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक रही है. कई लोककथाओं में राखी के साथ दिए गए वचन को विशेष महत्व दिया गया है. बेनीपुर चक की स्थानीय कथा भी इसी विश्वास से जुड़ी हुई बताई जाती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, बेनीपुर चक में रहने वाले यादव परिवार के पूर्वज अलीगढ़ जिले की अतरौली तहसील के सेमराई गांव में रहते थे. उस समय गांव में ठाकुर और यादव परिवारों के बीच रक्षाबंधन पर राखी बांधने की परंपरा थी. परिवारों के बीच सामाजिक संबंधों में राखी के रिश्ते को सम्मान और वचन से जोड़कर देखा जाता था.
एक घोड़ी ने बदल दी रिश्ते की कहानी
गांव में पीढ़ियों से सुनाई जाने वाली कथा के मुताबिक, एक बार यादव परिवार की बेटी ने ठाकुर परिवार के सदस्य को राखी बांधी. राखी के बदले उसने उपहार में ठाकुर परिवार की घोड़ी मांग ली. उस समय घोड़ा या घोड़ी केवल सवारी का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति से जुड़ी संपत्ति भी मानी जाती थी. ठाकुर परिवार ने राखी के रिश्ते का मान रखते हुए घोड़ी दे दी. यह घटना आगे चलकर दोनों परिवारों के बीच राखी के रिश्ते को एक अलग अर्थ देने वाली साबित हुई, ऐसी स्थानीय मान्यता है.
दूसरी राखी और जमीन-जायदाद का दावा
इसके बाद कथा में दूसरी घटना का उल्लेख आता है. मान्यता के मुताबिक, ठाकुर परिवार की बेटी ने यादव परिवार के सदस्य को राखी बांधी और उपहार के रूप में यादव परिवार की पूरी जमीन-जायदाद मांग ली. राखी के रिश्ते में दिए गए वचन को निभाने की परंपरा का हवाला देते हुए यादव परिवार ने अपनी जमीन-जायदाद देने की बात स्वीकार कर ली. इसके बाद यादव परिवार के सामने अपना गांव छोड़ने की स्थिति पैदा हुई. इसके बाद परिवार के सदस्य अलीगढ़ के सेमराई गांव से निकलकर संभल क्षेत्र की ओर आया और बाद में बेनीपुर चक में बस गया. इसी पलायन की घटना को गांव में रक्षाबंधन की परंपरा बदलने की शुरुआत के तौर पर याद किया जाता है.
जमीन से पलायन तक पहुंची कहानी
उत्तर भारत के ग्रामीण समाज के इतिहास में जमीन केवल संपत्ति नहीं रही है. खेती, परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक पहचान लंबे समय तक जमीन से जुड़ी रही. ऐसे में किसी परिवार का जमीन से वंचित होना या अपनी जमीन छोड़कर दूसरी जगह बसना उसके सामाजिक इतिहास में बड़ा बदलाव माना जाता था. बेनीपुर चक की स्थानीय कथा में भी जमीन और पलायन का यही संबंध दिखाई देता है. हालांकि घोड़ी और जमीन-जायदाद से जुड़ी इस कहानी की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय गांव की पीढ़ियों पुरानी मौखिक परंपरा और लोकस्मृति के रूप में देखना अधिक उचित है.
पीढ़ियां बदलीं, लेकिन परंपरा नहीं
समय बीतता गया. परिवार की कई पीढ़ियां बदल गईं और उनके लोग अलग-अलग इलाकों में जाकर बसते गए. लेकिन स्थानीय मान्यता के मुताबिक, रक्षाबंधन नहीं मनाने का फैसला पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा. आज भी बेनीपुर चक में रक्षाबंधन के दिन दूसरे गांवों जैसी चहल-पहल नहीं दिखाई देती. यहां राखी बांधने की परंपरा नहीं है. शादी के बाद गांव में आने वाली बहुएं भी इस परंपरा का हिस्सा बनती हैं और रक्षाबंधन के अवसर पर अपने भाइयों को राखी बांधने के लिए नहीं जातीं.
इतिहास और लोकविश्वास के बीच जिंदा है कहानी
बेनीपुर चक की कहानी सिर्फ रक्षाबंधन न मनाने की वजह नहीं बताती, बल्कि यह भी दिखाती है कि किस तरह किसी समुदाय की पुरानी स्मृतियां समय के साथ सामाजिक परंपराओं का रूप ले सकती हैं. एक घटना, उसका सामूहिक स्मरण और उससे जुड़ा विश्वास कई पीढ़ियों तक किसी गांव की पहचान को प्रभावित कर सकता है. आज जब रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक बन चुका है, बेनीपुर चक की परंपरा इस त्योहार का एक बिल्कुल अलग सामाजिक पक्ष सामने रखती है. यहां राखी का धागा बांधा नहीं जाता, लेकिन उसके साथ जुड़ी पुरानी कहानी आज भी गांव की स्मृतियों में मौजूद है.
