UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मातृत्व अवकाश को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि पहली और दूसरी संतान के जन्म के बीच दो वर्ष का अंतर होना अनिवार्य नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के अवकाश निरस्त करने के आदेश को रद्द करते हुए मामले में दो सप्ताह के भीतर नया निर्णय लेने का निर्देश दिया है.
स्टाफ नर्स की याचिका पर सुनाया फैसला
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने कानपुर नगर की स्टाफ नर्स शिखा यादव और एक अन्य की याचिका पर सुनाया. याचिकाकर्ताओं की मातृत्व अवकाश की अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि उत्तर प्रदेश वित्तीय हैंडबुक और वर्ष 2008 के शासनादेश के अनुसार पहले मातृत्व अवकाश के दो वर्ष के भीतर दूसरा मातृत्व अवकाश नहीं दिया जा सकता.
सामाजिक सुरक्षा संहिता को बताया प्रभावी
हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश वित्तीय हैंडबुक की कार्यपालिका संबंधी व्यवस्था संसद द्वारा बनाई गई सामाजिक सुरक्षा संहिता-2020 के प्रावधानों पर हावी नहीं हो सकती. अदालत ने कहा कि संहिता की धारा-161 स्पष्ट रूप से बताती है कि यदि किसी अन्य नियम, कानून या कार्यपालिका के निर्देश उससे असंगत हैं, तो सामाजिक सुरक्षा संहिता के प्रावधान लागू होंगे.
दो साल का अंतर अनिवार्य नहीं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सामाजिक सुरक्षा संहिता-2020 में पहली और दूसरी संतान के जन्म के बीच किसी न्यूनतम समय अंतराल की शर्त नहीं है. ऐसे में केवल दो वर्ष का अंतर न होने के आधार पर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को याचिकाकर्ताओं के आवेदन पर दो सप्ताह के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है.
