जेब में हमेशा इस्तीफा रखते थे सिंह साहब! जानिए UP के उस मुख्यमंत्री की सियासत, जिसने कुर्सी से बड़ा माना उसूल

UP Political Story: उत्तर प्रदेश के एक ऐसे मुख्यमंत्री की कहानी जिन्होंने सत्ता से ऊपर अपने सिद्धांतों को रखा. चौधरी चरण सिंह अपनी जेब में हमेशा इस्तीफा लेकर चलते थे, ताकि उसूलों पर समझौता न करना पड़े.

UP Political Story: कुर्सी बचाने के लिए समझौते करने वाले नेताओं की कहानियां आपने बहुत सुनी होंगी, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा मुख्यमंत्री भी हुआ, जिसने सत्ता से ज्यादा अपने सिद्धांतों को अहमियत दी. कहा जाता है कि वह हर वक्त अपनी जेब में इस्तीफा लेकर चलते थे, ताकि अगर कभी उसूलों से समझौता करने की नौबत आए तो बिना एक पल गंवाए पद छोड़ सकें. किसानों की आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने वाले इस नेता ने न सिर्फ यूपी की राजनीति की दिशा बदली, बल्कि पहली बार कांग्रेस को सत्ता से भी बाहर कर दिया. आखिर कौन थे ये मुख्यमंत्री और क्यों उनकी 'जेब में रखा इस्तीफा' आज भी राजनीतिक ईमानदारी की मिसाल माना जाता है? आइए जानते हैं 'UP CM के गजब किस्से' की यह दिलचस्प कहानी.

किसानों के मसीहा कैसे बने चौधरी चरण सिंह?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी किसानों की बात होती है, तो सबसे पहले जिस नेता का नाम लिया जाता है, वह हैं चौधरी चरण सिंह. उन्हें सिर्फ मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि उस नेता के रूप में याद किया जाता है जिसने गांव, खेत और किसानों की आवाज को देश की राजनीति के केंद्र में लाकर खड़ा किया. यही वजह है कि उन्हें आज भी ‘किसानों का मसीहा’ कहा जाता है.  लेकिन उनकी पहचान सिर्फ इतनी नहीं थी. उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनके सिद्धांत, जिन पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया.

कौन थे चौधरी चरण सिंह?

चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को मेरठ जिले के नूरपुर गांव में एक किसान परिवार में हुआ था. उन्होंने वर्ष 1923 में साइंस से ग्रेजुएशनकिया और 1925 में आगरा यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी कर गाजियाबाद में वकालत शुरू की. वर्ष 1929 में वह मेरठ आ गए और आजादी के आंदोलन से जुड़ गए. बाद में कांग्रेस के सदस्य बने और किसानों के अधिकार, जमीन सुधार तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया. यही सोच उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा किसान नेता बनाती चली गई.

जेब में हमेशा रहता था इस्तीफा

चौधरी चरण सिंह के बारे में यह किस्सा सिर्फ लोगों की जुबान तक सीमित नहीं है, बल्कि कई दस्तावेजों और किताबों में भी दर्ज है. चौधरी चरण सिंह आर्काइव में 17 फरवरी 1968 के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि "वे हमेशा अपना इस्तीफा अपने पास रखते थे और यदि उन्हें अपने नैतिक सिद्धांतों से समझौता करने के लिए कहा जाता, तो उसे देने में कभी हिचकिचाते नहीं थे." यही वजह थी कि उनके साथ काम करने वाले लोग भी जानते थे कि चरण सिंह किसी भी कीमत पर अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटेंगे.

किताबों में भी दर्ज है यह किस्सा

चौधरी चरण सिंह के करीबी रहे तिलक राम शर्मा ने अपनी किताब 'My Days With Chaudhary Charan Singh' में भी इस आदत का विस्तार से जिक्र किया है. किताब में उनका कथन दर्ज है— "मैं हमेशा अपनी जेब में इस्तीफा लेकर चलता था." यानी यह सिर्फ राजनीतिक चर्चा नहीं, बल्कि उनके बेहद करीबी लोगों के संस्मरणों का भी हिस्सा है. वहीं उनकी जीवनी 'Crusader Against Injustice, Exploitation and Corruption' में लिखा गया है कि 1946 के बाद उन्होंने नौ बार इस्तीफा दिया या इस्तीफा देने की पेशकश की. जब भी उन्हें लगा कि जनहित, आत्मसम्मान या सिद्धांतों से समझौता करना पड़ेगा, उन्होंने पद से ज्यादा अपने विचारों को महत्व दिया.

कांग्रेस में रहकर भी किसानों की आवाज बुलंद की

चौधरी चरण सिंह कांग्रेस में जरूर थे, लेकिन किसानों के मुद्दे पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. उनका मानना था कि सरकार की नीतियों का सबसे बड़ा फायदा गांव और किसान तक पहुंचना चाहिए. उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू कराने में उनकी अहम भूमिका रही. इस फैसले ने लाखों किसानों को जमीन पर अधिकार दिलाने का रास्ता खोला और उनकी पहचान एक मजबूत किसान नेता के रूप में पूरे देश में स्थापित हो गई.

फिर कांग्रेस से क्यों अलग हुए?

समय बीतने के साथ 1960 के दशक में कांग्रेस के भीतर मतभेद बढ़ने लगे. चौधरी चरण सिंह को महसूस होने लगा कि पार्टी किसानों के मुद्दों से ज्यादा सत्ता की राजनीति में उलझती जा रही है. 1967 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया. इसी दौरान उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया और दूसरे दलों के साथ मिलकर संयुक्त विधायक दल (SVD) की सरकार बनाई. यहीं से प्रदेश की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हुई.

पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई

3 अप्रैल 1967 को चौधरी चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि आजादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. राजनीतिक विश्लेषक इसे राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट मानते हैं. इसी दौर से उत्तर प्रदेश में गठबंधन राजनीति को भी नई दिशा मिली.

आज भी क्यों याद किया जाता है यह किस्सा?

चौधरी चरण सिंह की पहचान केवल मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने तक सीमित नहीं रही. उन्हें इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने पूरी राजनीतिक यात्रा में किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. सत्ता उनके लिए कभी अंतिम लक्ष्य नहीं रही. जब भी उसूलों और कुर्सी के बीच चुनाव करना पड़ा, उन्होंने हर बार अपने सिद्धांतों को चुना. यही कारण है कि आज भी उनका नाम भारतीय राजनीति में ईमानदारी, स्वाभिमान और किसान हितैषी नेतृत्व के प्रतीक के रूप में लिया जाता है.

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By Lucky Kumari

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