नोएडा की चकाचौंध में युवाओं की खाली जेब, 15 तारीख के बाद खर्चों का पहाड़, सैलरी से बचत तक पहुंचना हुआ मुश्किल

UP News: नोएडा की चकाचौंध में देश भर से युवा नौकरी के लिए आते हैं, लेकिन अच्छी सैलरी के बावजूद महीने के अंत तक जेब खाली रह जाती है. जानिए क्यों, युवाओं को खर्चों के बोझ का सामना करना पड़ता है.

UP News: नोएडा को रोजगार और बेहतर करियर के बड़े केंद्र के तौर पर देखा जाता है, इसलिए देश के अलग-अलग राज्यों से युवा यहां नौकरी करने पहुंचते हैं. अच्छी सैलरी की उम्मीद लेकर आने वाले इन युवाओं को शहर में रहने के बाद खर्चों की वास्तविक तस्वीर समझ आती है. किराया, खाना, ट्रांसपोर्ट, मोबाइल, बिजली और दूसरे जरूरी खर्चों के साथ परिवार को पैसे भेजने की जिम्मेदारी भी होती है. नतीजा यह कि महीने की शुरुआत में ठीक दिखने वाला बजट कुछ ही दिनों में बिगड़ने लगता है.

सैलरी की तारीख से 15 दिन तक राहत, फिर खर्चों का दबाव

बिहार के रहने वाले मयंक सिंह ने नोएडा की नौकरीपेशा जिंदगी का अनुभव साझा करते हुए बताया कि महीने की शुरुआत में सैलरी आने के बाद स्थिति सामान्य लगती है. लेकिन जरूरी भुगतान और रोजमर्रा के खर्च निकलते ही आर्थिक दबाव बढ़ जाता है. खासकर 15 से 40 हजार रुपये मासिक कमाने वालों के लिए स्थिति ज्यादा मुश्किल हो जाती है. मयंक के मुताबिक, महीने के दूसरे हिस्से में लोग गैरजरूरी खर्च रोक देते हैं और छोटी-छोटी जरूरतों को भी अगले वेतन तक टालने लगते हैं.

महंगाई ने बदली प्राथमिकताएं, बचत पीछे छूटी

नोएडा में करीब 15 साल से रह रहे विकास झा के मुताबिक, शहर में बढ़ती महंगाई ने मध्यम वर्ग के खर्च करने का तरीका बदल दिया है. रोजमर्रा की चीजों, ईंधन और रहने की लागत बढ़ने के कारण भविष्य के लिए बड़ी बचत करना कठिन हो गया है. उनका कहना है कि कई लोग घर या जमीन जैसी बड़ी संपत्ति खरीदने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन ईएमआई पर मोबाइल, कार या दूसरे सामान ले लेते हैं. इससे तत्काल जरूरतें पूरी होती हैं, लेकिन लंबी अवधि की आर्थिक सुरक्षा कमजोर रह जाती है.

किराया और रोजमर्रा का खर्च बना सबसे बड़ा बोझ

अतुल यादव बताते हैं कि नोएडा में कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ घर चलाने में निकल जाता है. सुबह ऑफिस जाने से लेकर रात तक खाने, आने-जाने और घरेलू जरूरतों पर लगातार पैसे खर्च होते हैं. उनका कहना है कि राशन और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर मासिक बजट पर पड़ता है. वहीं अलग कमरा लेने वालों के लिए किराया भी बड़ी चुनौती है. ऐसे में 15 से 30 हजार रुपये कमाने वाले कर्मचारी अगर परिवार की मदद भी करते हैं, तो उनके लिए बचत करना और भी मुश्किल हो जाता है.

कमाई बढ़ने से पहले बढ़ गई महंगाई, महीने का अंत खाली हाथ

सुधीर रॉय के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में महंगाई की रफ्तार ने नौकरीपेशा मध्यम वर्ग पर खासा दबाव बनाया है. उनका कहना है कि 30 से 40 हजार रुपये मासिक कमाने वाले लोग भी महीने के आखिरी सप्ताह में पैसों की कमी महसूस करते हैं. सामान और सेवाओं की कीमत बढ़ने के बाद उनके दाम वापस कम होना आसान नहीं है, जबकि वेतन में उतनी तेजी से बढ़ोतरी नहीं होती. यही वजह है कि नोएडा में रहने वाले युवाओं के सामने आज सिर्फ नौकरी ढूंढना नहीं, बल्कि महीने का बजट संभालना भी बड़ी चुनौती बन गया है.

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By नटवर कुमार

नटवर कुमार पत्रकारिता के क्षेत्र में दो वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले पत्रकार हैं.वे ग्राउंड रिपोर्टिंग और जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से कवर करते हैं. राजनीतिक घटनाक्रम, स्थानीय समस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों, अपराध, सामाजिक मुद्दों और आम लोगों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि है. उनका प्रयास खबरों को तथ्यात्मक, स्पष्ट और पाठकों के लिए उपयोगी तरीके से प्रस्तुत करना रहता है.नटवर कुमार ने इतिहास में मास्टर ऑफ आर्ट्स (M.A. History) और मास्टर इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की पढ़ाई पटना से की है. इतिहास और पत्रकारिता में उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें घटनाओं को व्यापक संदर्भ में समझने और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने में मदद करती है.इस दौरान उन्होंने दूरदर्शन पटना में भी समय दिया है. नटवर कुमार मूल रूप से बिहार के दिनकर की भूमि बेगूसराय जिले के रहने वाले हैं.

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