Indian Freedom Story: स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काशी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सिर्फ सड़कों पर संघर्ष नहीं किया, बल्कि विचारों और लेखनी के जरिए भी बड़ा योगदान दिया. बनारस में साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और क्रांतिकारियों ने मिलकर राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया. शहर की गलियों से निकलने वाले समाचार पत्र और साहित्य लोगों में आजादी की भावना जगाते थे. यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार काशी के बुद्धिजीवियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखती थी और कई प्रकाशनों को दबाने की कोशिश करती थी.
क्रांतिकारियों का दूसरा घर था बनारस
काशी को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों का दूसरा घर कहा जाता था. मुंशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, डॉ. संपूर्णानंद और पत्रकार बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे लोगों ने अपने विचारों से आंदोलन को मजबूत किया. 1930 के नमक आंदोलन और बाद में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बनारस में राष्ट्रीय चेतना तेजी से फैली. साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से अंग्रेजी नीतियों की आलोचना की जाती थी. ब्रिटिश सरकार इन गतिविधियों से परेशान थी और कई लेखों, पुस्तकों तथा समाचार पत्रों पर कार्रवाई करती थी.
रणभेरी ने अंग्रेजों की नींद उड़ाई
बाबूराव विष्णु पराड़कर से जुड़े आज और रणभेरी जैसे प्रकाशनों ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जुलाई 1930 में रणभेरी का प्रकाशन शुरू हुआ, लेकिन ब्रिटिश सरकार की सख्ती के कारण इसे खुले तौर पर निकालना मुश्किल था. इसके बावजूद काशी की गलियों और मोहल्लों में हाथ से चलने वाली प्रिंटिंग मशीनों से अखबार और पर्चे तैयार किए जाते थे. कई प्रतियों को पान के पत्तों या मिठाई के डिब्बों में छिपाकर दूसरी जगह पहुंचाया जाता था.
घरों में छिपकर छपते थे क्रांतिकारी अखबार
1942 में आंदोलन तेज होने के साथ काशी में भूमिगत गतिविधियां भी बढ़ गई थीं. कई घरों में क्रांतिकारियों की बैठकें होती थीं और गुप्त साहित्य सुरक्षित रखा जाता था. हाथ से चलने वाली मशीनों से समाचार, पर्चे और संदेश छापे जाते थे. अंग्रेज पुलिस को इसकी भनक लगती तो कई जगह छापेमारी की जाती थी. इसके बावजूद आंदोलनकारी लगातार अपने ठिकाने बदलते रहे. काशी हिंदू विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ जैसे संस्थानों ने भी युवाओं में राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की भावना मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई.
शिक्षा संस्थानों ने जगाई राष्ट्रीय चेतना
काशी के शैक्षणिक संस्थानों ने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय पहुंचे महात्मा गांधी ने देश की आजादी के लिए प्रभावशाली वर्गों से आगे आने का आह्वान किया था. काशी विद्यापीठ राष्ट्रीय शिक्षा और स्वदेशी विचारों का प्रमुख केंद्र बना. वर्ष 1923 में वाराणसी में राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन भी आयोजित हुआ, जिसमें देशभर की संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. शिक्षा के जरिए युवाओं में स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रभक्ति की भावना मजबूत की गई.
प्रेमचंद की लेखनी बनी अंग्रेजों की परेशानी
साहित्य के क्षेत्र में भी काशी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ मजबूत आवाज उठाई. मुंशी प्रेमचंद ने शुरुआती दौर में नवाब राय नाम से लेखन किया. उनकी पुस्तक सोजे वतन में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विचार थे, जिससे ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई. पुस्तक को जब्त करने का आदेश दिया गया और इसकी प्रतियों पर कार्रवाई की गई. इसके बाद उन्होंने प्रेमचंद नाम से लेखन जारी रखा. भारतेंदु हरिश्चंद्र, डॉ. संपूर्णानंद और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे लेखकों ने भी जनता को जागरूक किया.
अंग्रेजों के खिलाफ काशी का संघर्ष पुराना
काशी का अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध 1857 की क्रांति से भी पहले दिखाई देता है. वर्ष 1781 में राजा चेत सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह हुआ. इस संघर्ष ने काशी में ब्रिटिश सत्ता के विरोध की मजबूत परंपरा को जन्म दिया. बाद के वर्षों में चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी भी बनारस से जुड़े. ज्ञानवापी क्षेत्र की एक सभा के बाद उनकी गिरफ्तारी हुई और जेल में उन्हें सजा दी गई. इसी दौर में उनके नाम के साथ आजाद की पहचान जुड़ी.
पान, मिठाई और महफिलों से भी फैला संदेश
काशी के स्वतंत्रता आंदोलन में पान, मिठाई और सांस्कृतिक महफिलों की भूमिका भी उल्लेखनीय रही. पान के पत्तों में छोटे संदेश छिपाकर क्रांतिकारियों तक सूचनाएं पहुंचाने की बातें सामने आती हैं. तिरंगी बर्फी और दूसरी राष्ट्रवादी मिठाइयों के जरिए भी देशभक्ति की भावना व्यक्त की जाती थी. दालमंडी की महफिलों में देशभक्ति के गीत और आंदोलन से जुड़ी चर्चाएं होने का उल्लेख मिलता है. इस तरह काशी ने शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता, संस्कृति और प्रत्यक्ष संघर्ष के जरिए आजादी की लड़ाई को मजबूत किया.
यह भी देखें: काशी का वो अनोखा विद्रोह पान में छिपे संदेश, मिठाई में तिरंगा और महफिलों में गूंजा आजादी का तराना
