रहस्यों से घिरा बलिया का बाबा बालेश्वरनाथ धाम! गंगा के कटान ने खोला सदियों पुराना राज

UP News: बलिया का बाबा बालेश्वरनाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास और पौराणिक मान्यताओं का अद्भुत संगम है. मान्यता है कि गंगा की धारा बदलने के दौरान यह शिवलिंग धरती से प्रकट हुआ था. वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार, प्राचीन प्रमाण बताते हैं कि वर्तमान सुखपुरा से लेकर बिहार के भोजपुर ताल तक फैले क्षेत्र में गंगा की धारा लगातार अपना मार्ग बदलती रही. इसी क्षेत्र में दानवीर राजा बलि द्वारा स्थापित बालेश्वरनाथ शिवालय का अस्तित्व काफी प्राचीन माना जाता है.

UP News: उत्तर प्रदेश के बलिया शहर स्थित बाबा बालेश्वरनाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि इतिहास और पौराणिक मान्यताओं का भी अद्भुत संगम है. मान्यता है कि गंगा की धारा बदलने के दौरान यह शिवलिंग धरती से प्रकट हुआ था. इस मंदिर का उल्लेख वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने अपनी पुस्तक 'बलिया विरासत' में विस्तार से किया है, जिसमें मंदिर की ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि का वर्णन मिलता है.

राजा बलि से जुड़ता है मंदिर का इतिहास

वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार, प्राचीन प्रमाण बताते हैं कि वर्तमान सुखपुरा से लेकर बिहार के भोजपुर ताल तक फैले क्षेत्र में गंगा की धारा लगातार अपना मार्ग बदलती रही. इसी क्षेत्र में दानवीर राजा बलि द्वारा स्थापित बालेश्वरनाथ शिवालय का अस्तित्व काफी प्राचीन माना जाता है. मान्यता है कि असुरेन्द्र राजा बलि भगवान शिव के परम उपासक थे और उन्होंने स्वयं इस शिवलिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना की थी.

अमिलेखीय प्रमाणों में भी मिलता है उल्लेख

बलिया विरासत और बलिया और उसके निवासी पुस्तकों के अनुसार, कई प्राचीन अभिलेखों और स्थानीय मान्यताओं में इस शिवलिंग का उल्लेख मिलता है. इसमें बताया गया है कि यह वही शिवलिंग है जिसकी स्थापना राजा बलि ने की थी. यही कारण है कि मंदिर को आज भी क्षेत्र के सबसे प्राचीन शिवधामों में गिना जाता है.

गंगा कटान के बाद फिर हुआ मंदिर का निर्माण

इतिहासकार डाॅ.शिवकुमार सिंह कौशिकेय लिखते हैं कि वर्ष 1875 के आसपास एक किसान के खेत में यह शिवलिंग पुनः मिला. बाद में 1902 में गंगा कटान का खतरा बढ़ने पर शिवलिंग को सुरक्षित स्थान पर लाकर स्थापित किया गया, जिसे आज बाबा बालेश्वरनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है. इसके बाद 1918-19 में गंगा कटान से मंदिर पर दोबारा संकट आया. उस समय समाजसेवी वैद्य परिवार और लच्छू-बिल्लर भगत के प्रयासों से वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. बड़ी-बड़ी नावों से पत्थर मंगवाए गए और करीब एक वर्ष तक संगतराशों ने मंदिर निर्माण का कार्य किया.

आज भी अटूट है श्रद्धालुओं की आस्था

बाबा बालेश्वरनाथ मंदिर में आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं. सावन, महाशिवरात्रि और अन्य पर्वों पर यहां भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है. स्थानीय लोगों का मानना है कि बाबा बलेश्वरनाथ के दर्शन और पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

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By Tilak Kumar

तिलक कुमार पिछले 14 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है. अमर उजाला, प्रभात खबर, जनसंदेश टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में क्राइम रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं. अपराध, राजनीति और हाइपरलोकल पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता के क्षेत्र हैं. मैदानी रिपोर्टिंग के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली खबरों को पाठकों तक पहुंचाया है. जमीनी मुद्दों की गहरी समझ और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग उनकी पहचान रही है. वर्तमान में वह प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ जुड़े हुए हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध तथा जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार लेखन और रिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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