Rourkela News: एनआइटी राउरकेला ने विकसित की मल्टी-सेंसर एआइ प्रणाली, मरीजों के सोने के तरीके से स्वास्थ्य समस्याओं की हो सकेगी सटीक पहचान

Rourkela News: एनआइटी राउरकेला के शोधार्थियों ने मल्टी-सेंसर एआइ प्रणाली विकसित की है, जो सोने के तरीकों की पहचान कर सकती है.

Rourkela News: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक एआइ-सक्षम प्रणाली विकसित की है, जो मनुष्य के सोने के तरीकों पर नजर रख सकती है. यह स्वास्थ्य सेवाओं में उपयोगी है, क्योंकि यह मरीजों की गोपनीयता बनाये रखते हुए बिना किसी बाधा के उनकी निगरानी कर सकती है, यहां तक कि जब वे कंबल से ढके हों. इस शोध के निष्कर्ष आइइइइ सेंसर जर्नल में प्रकाशित हुए हैं.

तकनीक की अनुमानित लागत लगभग 30,000 रुपये होगी

इस शोध पत्र के सह-लेखक, एनआइटी राउरकेला के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रो सप्तर्षि चटर्जी और उनके बी-टेक छात्र शिलादित्य मंडल के साथ जाधवपुर यूनिवर्सिटी के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रो देबांगशु डे हैं. प्रो चटर्जी ने कहा कि इस प्रणाली को सीधे रोगी के बिस्तर पर लगाया जा सकता है, जिससे अस्पताल के मरीजों, बुजुर्गों और स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों की नींद की स्थिति की निगरानी की जा सकती है. मल्टी-मॉडल इमेजिंग सिस्टम के साथ एकीकृत मॉड्यूल के रूप में उपयोग के लिए इस तकनीक की अनुमानित लागत लगभग 30,000 रुपये होगी, जिसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के साथ और कम किया जा सकता है. अगले चरण में, शोध टीम इस तकनीक का उपयोग सोने के गलत तरीकों से संबंधित विशिष्ट स्वास्थ्य समस्याओं और अन्य बीमारियों की पहचान के लिए करने की योजना बना रही है.

रीढ़ की क्षति, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया और गठिया जैसी समस्याओं का चलेगा पता

दुनिया भर के अध्ययन बताते हैं कि लंबे समय तक सोने के खराब तरीके रीढ़, जोड़ों और नसों पर असमान दबाव डालकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकते हैं. एक शारीरिक रूप से सक्रिय व्यक्ति में भी इससे दीर्घकालिक मस्कुलोस्केलेटल दर्द, रीढ़ की क्षति, ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, नसों को नुकसान, पाचन समस्याएं, एसिड रिफ्लक्स और गठिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं. बिस्तर पर पड़े मरीजों के लिए खराब पोस्चर प्रेशर अल्सर (बेडसोर) जैसी गंभीर जटिलताएं उत्पन्न कर सकती है. वर्तमान में, मरीजों की पोस्चर की निगरानी अधिकतर मैन्युअल रूप से की जाती है, जो अस्पष्ट भी हो सकती है और इसमें मानवीय गलतियों की संभावना बनी रहती है. इसका एक विकल्प पहनने योग्य सेंसर हैं, लेकिन वे अक्सर महंगे और असुविधाजनक होते हैं. इसके अतिरिक्त कैमरा-आधारित प्रणालियां भी मौजूद हैं, लेकिन कम रोशनी, मरीज को ढका हुआ कंबल और गोपनीयता संबंधी चिंताओं के कारण उनकी उपयोगिता सीमित रहती है.

एआइ-आधारित प्रणाली में उपयोग किये गये हैं तीन प्रकार के सेंसर

1.) एक लॉन्ग-वेव इन्फ्रारेड इमेजिंग सेंसर, जो शरीर की गर्मी को ट्रैक करता है और बिना दृश्य चित्र कैप्चर किये, कंबल के नीचे भी सोने के तरीके की निगरानी करता है

2.) एक डेप्थ सेंसर, जो शरीर के आकार और पोस्चर को रिकॉर्ड करता है

3.) एक प्रेशर सेंसर, जो बिस्तर पर शरीर के वजन के वितरण को मापता है

कम रोशनी और विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से करता है काम

इन सेंसरों से मिले डेटा को समझने के लिए टीम ने एक जनरेटिव एआइ मॉडल बनाया है, जो ग्राफ-आधारित न्यूरल नेटवर्क की मदद से शरीर का स्पष्ट चित्र तैयार करता है और जोड़ों की स्थिति पहचानने में सक्षम है. विकसित प्रणाली के बारे में बताते हुए एनआइटी राउरकेला के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार अभियांत्रिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रो सप्तर्षि चटर्जी ने कहा कि हमारी प्रणाली जनरेटिव एआइ के साथ एक फ्यूजन तकनीक का उपयोग करती है, जिसमें लो-वेव इन्फ्रारेड, डेप्थ और प्रेशर मैप डेटा को मिलाकर बिना सीधे रेड ग्रीन ब्लू (आरजीबी) इमेज का उपयोग किये सोने के तरीके का पता लगाया जाता है. यह मॉडल कम रोशनी और विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से काम करता है. हीट-आधारित इमेजिंग, शरीर के आकार के डेटा और प्रेशर जानकारी को मिलाकर यह प्रणाली सटीक परिणाम देती है. प्रयोगशाला परीक्षणों में इस नो-कॉन्टैक्ट मॉडल ने लगभग 98% सटीकता प्राप्त की है, जिससे यह वास्तविक उपयोग के लिए विश्वसनीय बनता है.

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By BIPIN KUMAR YADAV

BIPIN KUMAR YADAV is a contributor at Prabhat Khabar.

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