नोवामुंडी से सुबोध मिश्रा की रिपोर्ट
West Singhbhum News: पश्चिम सिंहभूम के नोवामुंडी प्रखंड के कोड़ता-देशाउलि के टाटा स्टील की माइंस के प्रतिबंधित क्षेत्र में उस समय भावनात्मक और ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जब पूर्व विस्थापित ग्रामीणों ने अपने पारंपरिक ‘मागे परब’ के अवसर पर पूर्वजों की पूजा-अर्चना की. वर्षों पहले विस्थापित होने के बावजूद ग्रामीणों की आस्था और परंपरा आज भी उसी स्थल से जुड़ी हुई है.
8 किलोमीटर पैदल यात्रा कर पहुंचे देशाउलि स्थल
नोवामुंडी प्रखंड के गीतीलोर गांव से सैकड़ों ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में, नंगे पांव, ढोल-मांदर की थाप पर नाचते-गाते करीब 8 किलोमीटर पैदल यात्रा कर प्रतिबंधित क्षेत्र कोड़ता देशाउलि पहुंचे. ग्रामीणों के हाथों में तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियार थे. पूजा-अर्चना के लिए लाल मुर्गा और बोदा भी साथ ले जाया गया. यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का प्रतीक भी थी.
पुलिस की मौजूदगी में शांतिपूर्ण आयोजन
कार्यक्रम के दौरान पुलिस प्रशासन की टीम भी मौके पर मौजूद रही. चूंकि यह क्षेत्र टाटा स्टील की माइंस का प्रतिबंधित इलाका है, इसलिए प्रशासनिक समन्वय के साथ ग्रामीणों को प्रवेश की अनुमति दी गई. पुलिस की निगरानी में पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ.
पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अनुष्ठान
देशाउलि स्थल पर पहुंचकर ग्रामीण मुंडा और दिऊरी के नेतृत्व में पूर्वजों को याद करते हुए स्थल का शुद्धिकरण किया गया. पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत लाल मुर्गा और बोदा की बलि देकर पूजा-अर्चना की गई. मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य करते हुए ग्रामीणों ने अपने पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित की. पूरे वातावरण में आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकता की झलक स्पष्ट दिख रही थी.
1985 से जारी है परंपरा
कोड़ता के विस्थापित गुरा हेम्ब्रम ने बताया कि वर्ष 1985 से वे लोग यहां पूजा करते आ रहे हैं. माइंस शुरू होने के बाद वे विस्थापित होकर गीतीलोर गांव में बस गए, लेकिन उनके पूर्वजों की “शासन दिरी” और देशाउलि स्थल आज भी कोड़ता में ही स्थित है. यही कारण है कि वे हर वर्ष यहां आकर अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं और भविष्य में भी इस परंपरा को जारी रखेंगे.
जनप्रतिनिधि और संगठन के लोग रहे उपस्थित
मौके पर पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोगा, आदिवासी संगठन के अध्यक्ष घनश्याम हेंब्रम, ग्रामीण मुंडा, दिऊरी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे. सभी ने एक स्वर में कहा कि विस्थापन के बावजूद अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से उनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं होगा.
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जड़ों से जुड़ाव का संदेश
पूजा-अर्चना के उपरांत सभी ग्रामीण शांतिपूर्वक अपने-अपने घर लौट गए. हालांकि इस आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भूमि से भले ही दूरी बन गई हो, लेकिन पूर्वजों, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान से उनका रिश्ता आज भी अटूट है. यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी अस्मिता और इतिहास को सहेजने का जीवंत प्रमाण भी है.
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