गुवा से संदीप गुप्ता की रिपोर्ट
Naxalite Surrender: पश्चिमी सिंहभूम और सारंडा क्षेत्र में वर्षों तक सक्रिय रहे कई नक्सलियों के खिलाफ हत्या, लेवी वसूली, पुलिस बल पर हमला, विस्फोटक अधिनियम और आर्म्स एक्ट के तहत अलग-अलग थाना क्षेत्रों में मामले दर्ज रहे हैं. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार इन नक्सलियों ने जंगल क्षेत्रों में संगठन का नेटवर्क मजबूत करने, ग्रामीणों को प्रभावित करने और हथियारबंद दस्तों के संचालन में अहम भूमिका निभाई थी.
नीति हेंब्रम महिला दस्ते की सक्रिय सदस्य
नीति माई उर्फ नीति हेंब्रम का संबंध सारंडा जंगल क्षेत्र के एक आदिवासी परिवार से बताया जाता है. उसके पिता का नाम नापो उर्फ गुमिदा हेंब्रम है. ग्रामीण इलाकों में गरीबी, प्रशासन की कमजोर पहुंच और नक्सली प्रभाव के कारण वह कम उम्र में ही माओवादी संगठन से जुड़ गई थी. शुरुआती दौर में निति दस्ते के लिए राशन पहुंचाने, संदेश देने और ग्रामीण नेटवर्क तैयार करने का काम करती थी. बाद में वह हथियारबंद दस्ते में शामिल हो गई. पुलिस सूत्रों के अनुसार उसके खिलाफ गोईलकेरा, टोंटो, छोटानागरा, मनोहरपुर और चक्रधरपुर थाना क्षेत्रों में कई मामले दर्ज बताए जाते हैं. उस पर नक्सली गतिविधियों में शामिल रहने, पुलिस पार्टी पर हमले, लेवी वसूली और संगठन को सहयोग देने के आरोप रहे हैं. कई मामलों में वह फरार अभियुक्त भी रही. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार सारंडा क्षेत्र में महिला नक्सली नेटवर्क को मजबूत करने में उसकी भूमिका सामने आई थी.
लादू तिरिया पर कई थाना क्षेत्रों में दर्ज रहे मामले
लादू तिरिया के पिता का नाम चरण तिरिया बताया जाता है. वह भी सारंडा और कोल्हान क्षेत्र के जंगल गांव से जुड़ा रहा है. ग्रामीणों के अनुसार शुरुआती दिनों में वह मजदूरी और जंगल उत्पादों पर निर्भर था, लेकिन बाद में नक्सली संगठन के संपर्क में आ गया. संगठन ने उसे पुलिस गतिविधियों की जानकारी जुटाने और ग्रामीण युवकों की भर्ती कराने का जिम्मा सौंपा था. बाद में वह हथियारबंद दस्ते के साथ रहने लगा. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसके खिलाफ छोटानागरा, सोनुवा, गोईलकेरा, टोंटो और किरीबुरू थाना क्षेत्रों में उग्रवादी गतिविधियों, अवैध हथियार रखने, धमकी देने और लेवी वसूली से जुड़े मामले दर्ज बताए जाते हैं. कई अभियानों के दौरान उसका नाम वांछित नक्सलियों की सूची में भी शामिल रहा.
बिरसा कोड़ा उर्फ हरिसिंह पर भी गंभीर आरोप
बिरसा कोड़ा उर्फ हरिसिंह के पिता का नाम पेरमा कोड़ा बताया जाता है. वह कोल्हान क्षेत्र में सक्रिय माओवादी नेटवर्क से जुड़ा रहा. स्थानीय लोगों के अनुसार जंगल क्षेत्रों में बेरोजगारी, गरीबी और नक्सली प्रभाव के कारण वह संगठन में शामिल हुआ था. शुरुआत में वह सहयोगी सदस्य के रूप में काम करता था, लेकिन बाद में हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेकर सक्रिय दस्ते का हिस्सा बन गया. पुलिस के अनुसार उस पर पुलिस बल पर हमला, सड़क निर्माण कार्यों में बाधा पहुंचाने, ठेकेदारों से लेवी वसूली और माओवादी संगठन के लिए काम करने के आरोप रहे हैं. उसके खिलाफ गोईलकेरा, टोंटो, चाईबासा, मनोहरपुर और सारंडा क्षेत्र के विभिन्न थानों में कई मामले दर्ज बताए जाते हैं. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि कोल्हान क्षेत्र में सक्रिय कई दस्तों में कोड़ा उपनाम वाले कैडरों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है.
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लगातार कमजोर हो रहा नक्सली नेटवर्क
सुरक्षा बलों के लगातार अभियान, जंगल क्षेत्रों में नए कैंपों की स्थापना और सरकार की आत्मसमर्पण नीति के कारण सारंडा और कोल्हान क्षेत्र में नक्सली नेटवर्क लगातार कमजोर हो रहा है. कई सक्रिय नक्सली मुख्यधारा में लौट चुके हैं, जबकि कई अब भी सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की योजनाएं तेजी से लागू होती रहीं, तो भविष्य में युवाओं के नक्सली संगठनों की ओर जाने की संभावना काफी कम हो जाएगी.
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