खनिज संपदा से सरकार की तिजोरी भर रहा झारखंड का सारंडा, पर मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं यहां के आदिवासी

Jharkhand Saranda Forest: पश्चिम सिंहभूम के सारंडा जंगल में बसे 10 वैध वन ग्राम आज भी राजस्व ग्राम का दर्जा न मिलने के कारण विकास और बुनियादी अधिकारों से दूर हैं. 1905 से बसे इन गांवों के आदिवासियों ने अब सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है. पूरी ग्राउंड रिपोर्ट यहां पढ़ें.

Jharkhand Saranda Forest, पश्चिम सिंहभूम, (गुवा से संदीप की रिपोर्ट): खनिज संपदा से समृद्ध और एशिया के सबसे घने जंगलों में शुमार सारंडा के वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी आज भी प्रशासनिक उदासीनता और सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं. पश्चिम सिंहभूम जिले के घने सारंडा जंगल में बसे 10 वैध वन ग्राम (Forest Villages) दशकों बाद भी राजस्व ग्राम (Revenue Village) में तब्दील नहीं हो सके हैं. अपनी पहचान और वजूद की लड़ाई लड़ रहे इन गांवों के हजारों आदिवासी ग्रामीण आज के आधुनिक दौर में भी अपने बुनियादी और मूलभूत अधिकारों से पूरी तरह वंचित हैं.

1905 से बसाए गए थे गांव

ऐतिहासिक दस्तावेजों और जानकारी के अनुसार, इन वन ग्रामों को ब्रिटिश काल के दौरान वर्ष 1905 से 1927 के बीच वन विभाग द्वारा मुख्य रूप से जंगल संरक्षण और वनों की देखरेख के उद्देश्य से बसाया गया था. केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो पूरे झारखंड राज्य में कुल 14 वैध वन ग्राम चिन्हित हैं, जिनमें से अकेले 10 गांव सिर्फ इसी सारंडा वन क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं. इसके बावजूद, एक सदी से भी अधिक का समय बीत जाने के बाद भी इन्हें अब तक राजस्व ग्राम का कानूनी दर्जा नहीं मिल सका है.

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इन गांवों के ग्रामीण कर रहे हैं संघर्ष

प्रशासनिक उपेक्षा की वजह से संघर्ष कर रहे इन गांवों में मनोहरपुर प्रखंड के थोलकोबाद, तिरिलपोसी, नयागांव, दीघा, बिटकिलसोया, बलिबा और कुमडी शामिल हैं. इसके अलावा नोवामुंडी प्रखंड के करमपदा, नवागांव और भनगांव के ग्रामीण लंबे समय से आंदोलनरत हैं. ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि राजनीतिक दल और सरकारें केवल चुनाव के समय ही बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन मतदान खत्म होते ही इन फाइलों को सरकारी दफ्तरों के बस्तों में दबा दिया जाता है.

खतियान है पर रसीद नहीं कटती

इस प्रशासनिक पेंच का सबसे बड़ा नुकसान यहां की युवा पीढ़ी को उठाना पड़ रहा है. राजस्व ग्राम घोषित न होने के कारण यहां के निवासियों को जाति, आवासीय (Domicile) और अन्य जरूरी सरकारी प्रमाण पत्र बनवाने में एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है. विडंबना यह है कि वर्ष 1991-92 में इन ग्रामीणों को रैयती खतियान तो दे दिया गया, लेकिन आज तक उनकी मालगुजारी रसीद नहीं काटी जाती, जिससे भूमि का स्वामित्व अधर में है. इसके अलावा, आदिवासी समाज के पारंपरिक पदाधिकारियों जैसे मुंडा, डाकुआ और दिउरी को भी नियमतः मिलने वाले सरकारी मानदेय से वंचित रखा गया है.

खनिज से अरबों का राजस्व, पर मूल निवासी खाली हाथ

ग्रामीणों ने तीखा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि सारंडा का यह इलाका देश के सबसे अमीर खनिज क्षेत्रों में से एक है, जहां से खनन के जरिए सरकार को हर साल अरबों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है. लेकिन दुख की बात यह है कि इस धरती के असली हकदार और मूल निवासियों को उनके अधिकारों के नाम पर सिर्फ ठगा जा रहा है. ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और जिला प्रशासन व सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इन 10 वन ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित नहीं किया गया, तो वे उग्र और व्यापक आंदोलन की राह अपनाने पर मजबूर होंगे.

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Published by: Sameer oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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